राकेश बेदी ने बॉलीवुड में भेदभाव और स्टारडम के बदलाव पर की चर्चा
राकेश बेदी ने हाल ही में बॉलीवुड में भेदभाव और स्टारडम के बदलते स्वरूप पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जब उन्हें पैसे की आवश्यकता थी, लेकिन प्रोड्यूसर ने कहा कि पैसे हीरो के लिए रिजर्व हैं। बेदी ने इंडस्ट्री की हायरार्की और कलाकारों के बीच भेदभाव पर चर्चा की। इसके अलावा, उन्होंने आज के डिजिटल युग में शोहरत के पैमाने में आए बदलावों पर भी विचार किए। जानें उनके विचार और अनुभव इस लेख में।
Mon, 20 Apr 2026
बॉलीवुड में भेदभाव का अनुभव
प्रसिद्ध अभिनेता राकेश बेदी, जिन्होंने अपनी कॉमिक टाइमिंग और अभिनय से दर्शकों का दिल जीता है, ने हाल ही में बॉलीवुड के अंदरूनी कामकाज और स्टारडम के बदलते स्वरूप पर खुलकर चर्चा की। 'धुरंधर' वेब सीरीज में पाकिस्तानी नेता जमील जमाली का किरदार निभाने वाले बेदी ने अपने करियर के शुरुआती दिनों का एक किस्सा साझा किया, जो इंडस्ट्री में कलाकारों के बीच भेदभाव को उजागर करता है। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें एक फिल्म की शूटिंग के दौरान तुरंत पैसे की आवश्यकता थी। जब उन्होंने प्रोड्यूसर से पैसे मांगे, तो उन्हें बताया गया कि पैसे फिल्म के हीरो के लिए रिजर्व हैं। इस घटना ने उन्हें इंडस्ट्री की हायरार्की का अहसास कराया, जहाँ जाने-माने सितारों को विशेष ट्रीटमेंट मिलता है।
जब प्रोड्यूसर ने कहा- "पैसे हैं, पर तुम्हारे लिए नहीं"
एक इंटरव्यू में, राकेश बेदी ने उस समय को याद किया जब वह आर्थिक तंगी का सामना कर रहे थे। उन्होंने बताया कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें अपनी किश्त चुकाने के लिए पैसे की सख्त जरूरत थी। बेदी ने कहा कि सेट पर प्रोड्यूसर पैसे का पैकेट लेकर आया था। जब उन्होंने अपनी बकाया राशि मांगी, तो प्रोड्यूसर ने कहा कि पैसे नहीं हैं। जब बेदी ने पैकेट की ओर इशारा किया, तो प्रोड्यूसर ने कहा, 'यह पैसे हीरो को देने के लिए हैं।' इस घटना ने बेदी को यह समझने में मदद की कि इंडस्ट्री में एक कठोर हायरार्की है, जहाँ छोटे या सपोर्टिंग एक्टर्स की जरूरतों को बड़े सितारों की सुख-सुविधाओं से नीचे रखा जाता है।
स्टारडम का मूल्यांकन शेयर बाजार की तरह
इंडस्ट्री में 'इक्विटी' और सम्मान पर चर्चा करते हुए बेदी ने एक दिलचस्प तुलना की। उन्होंने कहा कि किसी कलाकार का स्टेटस शेयर बाजार की तरह होता है; जैसे एक शेयर की कीमत ₹10 से ₹1000 तक जा सकती है, वैसे ही सफलता मिलने पर लोगों का नजरिया रातों-रात बदल जाता है।
शोहरत का पैमाना बदल गया है
राकेश बेदी ने 'ये जो है जिंदगी', 'श्रीमान श्रीमती' और 'चश्मे बद्दूर' जैसे क्लासिक्स की तुलना आज के दौर से की। पहले, कलाकार एक मैगजीन में अपना नाम छपने पर खुश होते थे, जबकि आज एक छोटी सी बातचीत या वीडियो मिनटों में लाखों लोगों तक पहुँच जाता है। उन्होंने स्वीकार किया कि आज स्टारडम का पैमाना बहुत बड़ा हो गया है, और वह खुद को इस डिजिटल युग की त्वरित शोहरत के साथ ढालने की कोशिश कर रहे हैं।
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