राकेश बेदी: कैसे एक मजेदार वाक्य ने बदल दी उनकी जिंदगी?
राकेश बेदी का सफर
मुंबई, 30 नवंबर। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कुछ ही कलाकार ऐसे हैं, जिन्होंने अपने अभिनय के साथ-साथ सादगी को भी दर्शकों तक पहुंचाया है। इनमें से एक हैं राकेश बेदी, जिनकी कॉमिक टाइमिंग और सहजता ने उन्हें हर पीढ़ी का प्रिय बना दिया। 70 और 80 के दशक में, जब मनोरंजन के साधन सीमित थे, तब दूरदर्शन के कुछ कलाकार परिवारों का हिस्सा बन गए थे।
इस समय 'श्रीमान श्रीमती' के दिलरुबा, 'ये जो है जिंदगी' के राजा और 'चश्मे बद्दूर' के ओमी जैसे किरदार लोगों की बातचीत का हिस्सा बन चुके थे। उन्होंने एक बार मजाक में कहा था कि वह शायद गलत पते पर आ गए हैं, और उन्हें नहीं पता था कि यह वाक्य उनके जीवन की दिशा बदल देगा।
राकेश बेदी का जन्म 1 दिसंबर 1954 को दिल्ली के करोल बाग में हुआ। उनके पिता, गोपाल बेदी, इंडियन एयरलाइन्स में एयरक्राफ्ट इंजीनियर थे और चाहते थे कि उनका बेटा पढ़ाई में आगे बढ़े। राकेश ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में प्राप्त की, लेकिन उनका ध्यान पढ़ाई से ज्यादा अभिनय की ओर था। उन्होंने कई इंटरव्यू में कहा कि उन्हें पढ़ाई से ज्यादा मंच पर अभिनय करना पसंद था।
स्कूल के दिनों में ही उन्होंने मोनो-एक्टिंग प्रतियोगिताओं में भाग लेना शुरू किया और कई पुरस्कार जीते। इन छोटे मंचों पर मिली तालियों ने उनके भीतर के कलाकार को जागृत किया, लेकिन घर पर इस फैसले का विरोध होता रहा।
उनके माता-पिता चाहते थे कि वह इंजीनियरिंग करें, इसलिए उन्हें इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम देने के लिए भेजा गया। यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया। परीक्षा शुरू होने के कुछ ही मिनटों बाद, वह आंसर शीट लेकर बाहर आ गए और परीक्षकों से कहा, 'मैं गलत पते पर आ गया हूं।' यह सुनकर सभी चौंक गए, लेकिन राकेश के लिए यह पल निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने अपने दिल की बात सुनी और अभिनय की ओर बढ़े।
इस निर्णय ने उन्हें पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट (एफटीआईआई) तक पहुंचाया, जहां उन्होंने अभिनय की गहराई से शिक्षा ली और थिएटर में कदम रखा। एफटीआईआई में उन्होंने 'लव इन पेरिस, वॉर इन कच्छ' नाटक में शानदार प्रदर्शन किया, जिसने 'शोले' के निर्माता जे.पी. सिप्पी पर गहरा प्रभाव डाला। सिप्पी ने उन्हें अपनी फिल्म 'एहसास' में काम करने का मौका दिया, जो उनके लिए किसी कैम्पस प्लेसमेंट से कम नहीं था।
इसके बाद, राकेश ने थिएटर, फिल्म और टीवी तीनों माध्यमों में काम किया। उनका मशहूर वन-मैन शो 'मसाज' आज भी थिएटर के इतिहास में दर्ज है, जिसमें उन्होंने 24 अलग-अलग किरदार निभाए। उन्होंने 150 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें 'चश्मे बद्दूर', 'राम तेरी गंगा मैली', 'दिल है कि मानता नहीं', 'गदर', 'उरी' और 'कूली नंबर 1' शामिल हैं। दूरदर्शन पर उनका जलवा और भी बढ़ा, 'ये जो है जिंदगी', 'श्रीमान श्रीमती', 'यस बॉस' और 'भाबीजी घर पर हैं' जैसे सीरियल्स ने उन्हें हर उम्र के दर्शकों का प्रिय बना दिया।
राकेश बेदी ने अपने करियर में टाइपकास्ट होने की चुनौती का सामना किया, लेकिन उन्होंने इसे कमजोरी नहीं माना। उनका कहना है कि उस समय फिल्मों में एक हीरो, एक हीरोइन और एक खलनायक का टेम्पलेट होता था, इसलिए कॉमेडी उनके जैसे कलाकारों के लिए सबसे मजबूत रास्ता था। यही कारण है कि आज भी उनके किरदार लोगों की यादों में ताजा हैं।
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