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मेहदी हसन: संघर्ष से शहंशाह-ए-गजल बनने की प्रेरणादायक कहानी

मेहदी हसन, जिन्हें 'शहंशाह-ए-गजल' के नाम से जाना जाता है, ने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया। साइकिल मैकेनिक के रूप में काम करते हुए भी उन्होंने संगीत का अभ्यास नहीं छोड़ा। उनकी गज़लें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी और कैसे उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई।
 
मेहदी हसन: संघर्ष से शहंशाह-ए-गजल बनने की प्रेरणादायक कहानी

मेहदी हसन का अद्भुत सफर




मुंबई, 12 जून। संगीत की दुनिया में मेहदी हसन को 'शहंशाह-ए-गजल' के नाम से जाना जाता है। उनकी आवाज़ में एक अनोखी मिठास और दर्द होता था, जो सुनने वालों को उनकी गज़लों में खो जाने पर मजबूर कर देता था। उन्होंने अपने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया, जिसमें परिवार का भरण-पोषण करने के लिए साइकिल मैकेनिक का काम करना भी शामिल था। उनकी यह प्रेरणादायक कहानी आज भी लाखों लोगों के लिए एक उदाहरण है। 13 जून 2012 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका सफर यह दर्शाता है कि कठिनाइयाँ किसी को भी अपने लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकतीं।


मेहदी हसन का जन्म 18 जुलाई 1927 को राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूना गांव में हुआ। उनका परिवार संगीत से भरा हुआ था, जहाँ उनके पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान जैसे प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक थे। इस माहौल ने मेहदी को छोटी उम्र से ही संगीत की ओर आकर्षित किया। जब अन्य बच्चे खेलकूद में व्यस्त होते थे, तब मेहदी घंटों रियाज करते थे। उन्होंने आठ साल की उम्र से संगीत की शिक्षा लेना शुरू किया और युवावस्था में ध्रुपद, ठुमरी और खयाल जैसी शैलियों में महारत हासिल कर ली।


हालांकि, 1947 में भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के बाद उनकी जिंदगी में कठिनाई का दौर आया। उन्हें अपने घर को छोड़कर पाकिस्तान जाना पड़ा, जहाँ आर्थिक तंगी ने उनके परिवार को जकड़ लिया। ऐसे में, मेहदी ने मजबूरी में एक साइकिल की दुकान पर मैकेनिक का काम शुरू किया। दिनभर मेहनत करने के बाद भी उन्होंने रात में संगीत का अभ्यास जारी रखा।


करीब दस साल की मेहनत के बाद, 1957 में उन्हें रेडियो पाकिस्तान पर गाने का अवसर मिला। उन्होंने ठुमरी गाई, जिसे लोगों ने बहुत पसंद किया। धीरे-धीरे, उन्होंने गज़ल गायकी में कदम रखा और उनकी अनोखी शैली ने उन्हें प्रसिद्ध बना दिया।


मेहदी हसन की गज़लें भारत और पाकिस्तान दोनों में बेहद लोकप्रिय हो गईं। 'रंजिश ही सही', 'गुलों में रंग भरे', 'रफ्ता रफ्ता वो मेरे हस्ती का सामां हो गए' और 'अब के हम बिछड़े' जैसी गज़लें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। महान गायिका लता मंगेशकर ने एक बार कहा था कि ऐसा लगता है जैसे मेहदी हसन के गले में भगवान बोलते हैं।


उनकी कला और योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार मिले, जैसे 'प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस', 'तमगा-ए-इम्तियाज', 'हिलाल-ए-इम्तियाज' और 'निशान-ए-इम्तियाज'। भारत में भी उन्हें 1979 में के.एल. सहगल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। नेपाल सरकार ने भी उन्हें गोरखा दक्षिण बाहु सम्मान दिया।


मेहदी हसन ने दो शादियाँ कीं और उनका एक बड़ा परिवार था, जिसमें कई बच्चों ने भी संगीत को अपना करियर बनाया। अपने अंतिम वर्षों में वह बीमार रहे, लेकिन संगीत से उनका रिश्ता कभी नहीं टूटा। 13 जून 2012 को कराची में उनका निधन हो गया।


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