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भारतीय सिनेमा के दिग्गज पी. जयराज: मूक फिल्मों से लेकर बोलती फिल्मों तक का सफर

पी. जयराज, भारतीय सिनेमा के एक अद्वितीय अभिनेता, ने मूक फिल्मों से लेकर बोलती फिल्मों तक का सफर तय किया। उनका जन्म 1909 में हुआ और उन्होंने लगभग 300 फिल्मों में काम किया। जयराज ने कई ऐतिहासिक किरदार निभाए और 1980 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित हुए। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और उनके योगदान के बारे में।
 

पी. जयराज का अद्वितीय सफर


नई दिल्ली, 10 अगस्त। यह कहानी है एक ऐसे भारतीय फिल्म अभिनेता की, जिन्होंने मूक फिल्मों के युग से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में सभी के दिलों में जगह बना ली। उनका प्रभाव आज भी आधुनिक सिनेमा में महसूस किया जाता है। हम बात कर रहे हैं प्रसिद्ध निर्माता, निर्देशक और अभिनेता पी. जयराज की। भारतीय सिनेमा के इतिहास में उनका नाम हमेशा प्रमुखता से लिया जाएगा।


पी. जयराज का जन्म 28 सितंबर 1909 को तेलंगाना के करीमनगर में हुआ। जब वे निजाम कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने 'शेक्सपियर' के नाटकों में भाग लेना शुरू किया। उनका परिवार काफी संपन्न था, उनके मामा की शादी सरोजनी नायडू से हुई थी और उनके पिता एक उच्च सरकारी पद पर थे।


जयराज के पड़ोसी पहले से ही फिल्म उद्योग में थे, जिन्होंने उन्हें इस चमकदार दुनिया में कदम रखने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने दादा साहेब फाल्के के साथ मूक फिल्मों में अपने करियर की शुरुआत की। जयराज ने लगभग 11 साइलेंट फिल्मों में अभिनय किया और फिल्म निर्माण के हर पहलू में रुचि दिखाई।


उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में काम करना शुरू किया और 'प्रतिभा' नामक फिल्म से निर्देशन में कदम रखा। 1929 में 'जगमगाती जवानी' में बतौर अभिनेता उनका पहला ब्रेक मिला। उनकी पहली बोलती फिल्म 'शिकारी' 1932 में आई, जिसमें उन्होंने एक बौद्ध भिक्षु का किरदार निभाया।


अपने करियर में जयराज ने लगभग 300 फिल्मों में काम किया, जिनमें से 160 में उन्होंने नायक की भूमिका निभाई। वे तेलुगु भाषी थे, लेकिन हिंदी, गुजराती और मराठी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया। 'बादबान', 'हातिम ताई', 'परदेसी' और 'रजिया सुल्तान' जैसी कई चर्चित फिल्मों में उनकी अदाकारी को सराहा गया।


1950 और 60 के दशक में, जयराज ने कई महत्वपूर्ण किरदार निभाए। उन्होंने अमर सिंह राठौर, पृथ्वीराज चौहान और महाराणा प्रताप जैसे ऐतिहासिक नायकों को जीवंत किया। इसके अलावा, उन्होंने चंद्रशेखर आजाद का भी किरदार निभाया। जयराज एक कुशल घुड़सवार भी थे।


उनकी आखिरी फिल्म 'खूनी कौन, मुजरिम कौन' 1965 में आई। उन्होंने इंडो-रशियन फिल्म 'परदेसी' में भी अभिनय किया।


एक निर्माता के रूप में, उन्होंने 1951 में 'सागर' का निर्माण किया, जो लॉर्ड टेनीसन की कहानी पर आधारित थी। हालांकि, इस फिल्म ने उन्हें आर्थिक नुकसान पहुंचाया, जिसके बाद उन्हें फिर से अभिनय करना पड़ा।


पी. जयराज ने लगभग 70 वर्षों तक फिल्म उद्योग में सक्रिय रहकर 'गिनीज बुक' में अपना नाम दर्ज कराया। 1980 में उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 11 अगस्त 2000 को 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।


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