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भारतीय रंगमंच के दिग्गज हबीब तनवीर: एक अनोखी यात्रा

हबीब तनवीर, भारतीय रंगमंच के एक अद्वितीय व्यक्तित्व, ने लोक कला को नई पहचान दी। उनका जन्म 1923 में रायपुर में हुआ और उन्होंने अपने करियर की शुरुआत पत्रकारिता से की। उन्होंने भारतीय गांवों के कलाकारों को मंच पर लाने का कार्य किया और कई यादगार नाटक प्रस्तुत किए। उनके योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार मिले। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियों के बारे में।
 
भारतीय रंगमंच के दिग्गज हबीब तनवीर: एक अनोखी यात्रा

हबीब तनवीर का रंगमंचीय सफर


मुंबई, 7 जून। जब भारतीय रंगमंच की चर्चा होती है, तो हबीब तनवीर का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने विदेश में आधुनिक रंगमंच की शिक्षा प्राप्त की, लेकिन उनकी रुचि भारतीय गांवों और लोक कलाकारों में गहरी थी। यही कारण है कि उन्होंने पश्चिमी रंगमंच की बजाय भारतीय लोक कला को प्राथमिकता दी। 8 जून 2009 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी रंग परंपरा आज भी जीवित है।


हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को रायपुर, छत्तीसगढ़ में हुआ। उनका असली नाम हबीब अहमद खान था। बचपन से ही उन्हें कविता और साहित्य में गहरी रुचि थी। वे शायरी लिखते थे और 'तनवीर' नाम से अपनी रचनाएं प्रकाशित करते थे। यह नाम बाद में उनकी पहचान बन गया। उनके पिता चाहते थे कि वे एक सरकारी अधिकारी बनें, लेकिन हबीब ने कला और साहित्य को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।


उन्होंने अपने करियर की शुरुआत पत्रकारिता और रेडियो से की। मुंबई आने के बाद, उन्होंने कई पत्रिकाओं में काम किया और ऑल इंडिया रेडियो से भी जुड़े। इसी दौरान उनका संपर्क इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (आईपीटीए) से हुआ, जो उस समय जनवादी रंगमंच का एक बड़ा आंदोलन था। यहां काम करते हुए उन्होंने समझा कि नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने का एक प्रभावी माध्यम भी हो सकता है।


रंगमंच के प्रति अपने जुनून को और बढ़ाने के लिए, वे 1950 के दशक में लंदन गए। वहां उन्होंने आधुनिक थिएटर तकनीकों का अध्ययन किया। यूरोप में रहते हुए उन्होंने विश्व रंगमंच को करीब से देखा, लेकिन जब वे भारत लौटे, तो उन्होंने भारतीय रंगमंच की असली ताकत गांवों और लोक परंपराओं में खोजी।


रायपुर लौटने के बाद, उन्होंने छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध लोकनाट्य शैली 'नाचा' का गहराई से अध्ययन किया। गांवों में साधारण कलाकारों को मंच पर अभिनय करते देखकर वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने इन कलाकारों में वह प्रतिभा देखी, जिसे बड़े शहरों के मंचों पर शायद ही कभी मौका मिला हो। इसके बाद, उन्होंने गांव के कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल किया और नए प्रयोग शुरू किए।


हबीब तनवीर ने 'आगरा बाजार', 'मिट्टी की गाड़ी', 'चरणदास चोर', 'पोंगा पंडित', 'जिन लाहौर नइ देख्या' और 'गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद' जैसे कई यादगार नाटक प्रस्तुत किए। उनके नाटकों में लोकभाषा, लोकगीत और आम लोगों की जिंदगी का चित्रण होता था। 'चरणदास चोर' अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान पाने वाला पहला भारतीय नाटक बना।


उनके योगदान के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और पद्म विभूषण जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। फ्रांस सरकार ने भी उन्हें अपने बड़े सांस्कृतिक सम्मान से नवाजा। इसके अलावा, वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे और भारतीय रंगमंच को नई दिशा देने में सक्रिय रहे।


8 जून 2009 को भोपाल में हबीब तनवीर का निधन हो गया।


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