पृथ्वीराज कपूर: थिएटर से लेकर सिनेमा तक, एक अद्वितीय यात्रा
पृथ्वीराज कपूर का अद्वितीय सफर
मुंबई, 2 नवंबर। हिंदी फिल्म उद्योग में कुछ ऐसे कलाकार हैं जिन्होंने न केवल फिल्मों में बल्कि थिएटर में भी अपनी छाप छोड़ी है। पृथ्वीराज कपूर ऐसे ही एक कलाकार हैं, जिन्होंने सिनेमा के साथ-साथ थिएटर के प्रति अपनी निष्ठा दिखाई। सांसद बनने के बावजूद, उन्होंने अपनी थिएटर टीम के साथ थर्ड क्लास में यात्रा करना जारी रखा। उनकी कंपनी ने 112 शहरों में 2,662 शो किए, जिसमें उन्होंने हर बार मुख्य भूमिका निभाई।
पृथ्वीराज कपूर का जन्म 3 नवंबर 1906 को पंजाब के समुंदरी में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता बशेश्वरनाथ कपूर पुलिस विभाग में कार्यरत थे। बचपन से ही उन्हें अभिनय और नाटक देखने का शौक था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए पेशावर गए, जहां उनका झुकाव थिएटर की ओर बढ़ा। कानून की पढ़ाई शुरू करने के बावजूद, उन्होंने इसे छोड़कर अभिनय का रास्ता चुना।
1928 में अपने सपनों को पूरा करने के लिए मुंबई पहुंचे, जहां उन्हें शुरुआत में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने छोटे-छोटे रोल किए और 1930 में मूक फिल्म 'सिनेमा गर्ल' से पहचान बनानी शुरू की। 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' में उनकी आवाज और अभिनय ने दर्शकों का ध्यान खींचा।
इसके बाद, उन्होंने कई फिल्मों में काम किया और कोलकाता के न्यू थिएटर्स से जुड़े। फिल्म 'विद्यापति' में उनके अभिनय को सराहा गया। 1941 में सोहराब मोदी की फिल्म 'सिकंदर' में उनकी भूमिका ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। इसके बाद 'आवारा', 'दहेज' और 'मुगल-ए-आजम' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया।
फिल्मों में सफलता के बावजूद, पृथ्वीराज कपूर का थिएटर के प्रति प्रेम कभी कम नहीं हुआ। 1944 में उन्होंने 'पृथ्वी थिएटर्स' की स्थापना की, जिसका उद्देश्य अच्छे नाटकों का निर्माण करना और उन्हें देशभर में प्रस्तुत करना था। उनका पहला नाटक 'शकुंतला' था, इसके बाद 'दीवार', 'पठान', 'गद्दार', 'आहूति' और 'पैसा' जैसे नाटक पेश किए।
पृथ्वी थिएटर्स का सफर आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने 16 वर्षों में 112 शहरों में 2,662 शो किए। वह अपनी टीम के साथ थर्ड क्लास में यात्रा करते थे, भले ही वह राज्यसभा के मनोनीत सांसद बने। 1952 से 1960 तक वह राज्यसभा के सदस्य रहे, लेकिन उन्होंने अपनी थिएटर टीम से अलग यात्रा करना पसंद नहीं किया। 1960 में उनकी खराब सेहत के कारण पृथ्वी थिएटर्स बंद हो गया।
पृथ्वीराज कपूर को भारतीय थिएटर और सिनेमा में उनके योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले, जिनमें 1954 में संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप और 1969 में पद्म भूषण शामिल हैं। 1971 में उन्हें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। उनका निधन 29 मई 1972 को मुंबई में हुआ, जब वह कैंसर से पीड़ित थे।
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