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पाकिस्तानी गायिका रेशमा: एक आवाज जो दिलों में बसी है

पाकिस्तानी लोक गायिका रेशमा की आवाज ने न केवल पाकिस्तान बल्कि भारत में भी लोगों के दिलों को छुआ। उनकी यात्रा, संघर्ष और संगीत की दुनिया में उनकी पहचान के बारे में जानें। रेशमा का गाना 'लंबी जुदाई' आज भी लोगों को भावुक कर देता है। जानें उनके जीवन के अनकहे किस्से और संगीत के प्रति उनके जज्बात।
 

रेशमा की अद्भुत यात्रा

नई दिल्ली, 2 नवंबर। संगीत की कोई सीमाएं नहीं होतीं, और सुर किसी एक देश के नहीं होते। कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जो सीधे लोगों के दिलों में बस जाती हैं। पाकिस्तानी लोक गायिका रेशमा भी ऐसी ही एक अद्भुत आवाज की स्वामिनी थीं। उनकी रूहानी आवाज में मिट्टी की खुशबू, दर्द और एक अनोखी कशिश थी। भले ही उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकांश समय पाकिस्तान में बिताया, लेकिन भारत में भी उन्हें अपार प्रेम मिला। 1983 में आई फिल्म 'हीरो' का प्रसिद्ध गाना 'लंबी जुदाई' उनकी पहचान बन गया। आज भी जब यह गाना गूंजता है, तो सुनने वालों की आंखों में आंसू आ जाते हैं।


रेशमा का जन्म 1 जनवरी 1947 को राजस्थान के बीकानेर के पास लोहा गांव में एक बंजारा परिवार में हुआ। भारत-पाकिस्तान के विभाजन के समय उनका परिवार पाकिस्तान चला गया, जब वे केवल एक महीने की थीं। इसके बाद उनका परिवार कराची में बस गया। रेशमा ने बहुत कम उम्र में गाना शुरू किया और मजारों पर सूफी गीत गाने लगीं। उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि लोग उन्हें सुनने के लिए रुक जाते थे, हालांकि उन्होंने कभी औपचारिक संगीत की शिक्षा नहीं ली।


रेशमा की जिंदगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब 12 साल की उम्र में पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविजन प्रोड्यूसर सलीम गिलानी ने उन्हें देखा। उन्होंने रेशमा के टैलेंट को पहचाना और उन्हें अपनी आवाज को दुनिया के सामने लाने का अवसर दिया। 1968 में उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के लिए 'लाल मेरी पत रखियो...' गाया, जिसने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई और वे सूफी गायिका के रूप में मशहूर हो गईं। उनकी आवाज में दिखावा नहीं था, बल्कि दिल से निकले जज्बात थे।


रेशमा के करियर का सबसे यादगार क्षण 1983 में आया, जब निर्देशक सुभाष घई की फिल्म 'हीरो' रिलीज हुई। कहा जाता है कि सुभाष घई ने पहली बार 1982 में राज कपूर की एक पार्टी में रेशमा को गाते हुए सुना और उनकी आवाज से प्रभावित होकर अपनी अगली फिल्म में उन्हें गाने का मौका दिया।


हालांकि, रेशमा शुरुआत में स्टूडियो में गाने के लिए तैयार नहीं थीं। उनका कहना था कि वे खुले माहौल में गाना पसंद करती हैं। सुभाष घई ने उन्हें आश्वस्त किया कि रिकॉर्डिंग के दौरान उनकी पसंद का ध्यान रखा जाएगा। इसके बाद रेशमा ने फिल्म 'हीरो' के लिए गाना गाने का निर्णय लिया।


गाने की रिकॉर्डिंग की कहानी भी दिलचस्प है। रेशमा ने संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से भारी संगीत के बजाय साधारण साज रखने की बात कही। उन्होंने एक मटका मंगवाया और जमीन पर बैठकर उसकी थाप के साथ गाना शुरू किया। गाने के बोल थे, 'हिज्र की ऊंची दीवार बनाई...' लेकिन रेशमा बार-बार 'बनाई' की जगह 'गिराई' गा रही थीं। संगीतकार प्यारेलाल ने उन्हें सही शब्द बताने की कोशिश की, लेकिन रेशमा वही शब्द दोहराती रहीं। इससे नाराज होकर प्यारेलाल स्टूडियो से बाहर चले गए, लेकिन लक्ष्मीकांत ने उनके जज्बात को समझते हुए गाने को उसी अंदाज में रिकॉर्ड करने का निर्णय लिया। रेशमा ने अपनी सादगी से बताया कि पढ़ाई न करने के कारण उनसे शब्दों में गलती हो जाती है।


रेशमा ने अपनी गायकी से बहुत नाम कमाया, लेकिन उनके जीवन के अंतिम वर्ष कठिनाइयों से भरे रहे। वे गले के कैंसर से पीड़ित थीं और उनका परिवार आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा था। 3 नवंबर 2013 को रेशमा ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


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