पंकज त्रिपाठी: संघर्ष से सफलता की कहानी, कैसे बने हिंदी सिनेमा के सितारे?
पंकज त्रिपाठी का सफर
मुंबई, 4 सितंबर। पंकज त्रिपाठी आज हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के उन नामों में से एक हैं, जिनका नाम सुनते ही दर्शकों में उत्सुकता बढ़ जाती है। यह सफलता उन्हें रातोंरात नहीं मिली। बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर मुंबई तक पहुंचने की उनकी यात्रा में खेतों, थिएटर, होटल की रात की शिफ्ट और कई वर्षों का संघर्ष शामिल है। आज जिस अभिनेता को बड़े सितारों के साथ देखा जाता है, वह कभी होटल की रसोई में काम किया करते थे और दिन में थिएटर में अभिनय करते थे।
पंकज त्रिपाठी का जन्म 5 सितंबर 1976 को बिहार के गोपालगंज जिले के बेलसंड गांव में हुआ। उनके पिता एक किसान और पुजारी थे। उनका परिवार साधारण था और उनका बचपन गांव के माहौल में बीता। उन्होंने गांव के नाटकों में भाग लिया और स्कूल के दिनों में पटना में एक नाटक देखकर अभिनय के प्रति अपनी रुचि को और बढ़ाया। उस नाटक के एक अभिनेता की अदाकारी ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उनकी आंखों में आंसू आ गए। इसके बाद से वह पटना में होने वाले थिएटर देखने जाने लगे।
लगभग 1996 में, पंकज ने खुद थिएटर करना शुरू किया। लेकिन अभिनय से जीवन यापन करना आसान नहीं था, इसलिए उन्हें नौकरी भी करनी पड़ी। यहीं से उनकी जिंदगी का वह कठिन दौर शुरू हुआ, जब वह रात में होटल की रसोई में काम करते थे और दिन में थिएटर करते थे। उन्होंने लगभग दो साल तक नाइट शिफ्ट में काम किया। उनकी दिनचर्या बेहद कठिन थी। रात में होटल में काम करने के बाद वह कुछ घंटे सोते और फिर थिएटर के लिए निकल जाते।
एक साक्षात्कार में, पंकज ने बताया कि उस समय उनकी आय का एक बड़ा स्रोत होटल की नौकरी थी। महंगे अभिनय स्कूल में जाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उनका सपना नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिला लेना था। उन्होंने एनएसडी की परीक्षा कई बार दी और अंततः 2001 में उनका चयन हुआ। 2004 में एनएसडी की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह मुंबई पहुंचे। यहां भी उनकी शुरुआत आसान नहीं थी। 16 अक्टूबर 2004 को मुंबई पहुंचने पर उनके पास केवल 46 हजार रुपए थे, लेकिन कुछ समय बाद उनके पास सिर्फ 10 रुपए रह गए।
मुंबई में पंकज ने छोटे-छोटे रोल से अपने करियर की शुरुआत की। 'रन', 'अपहरण', 'ओमकारा', 'शौर्य', 'रावण' और 'अग्निपथ' जैसी फिल्मों में उन्हें छोटे किरदार मिले। उन्होंने टीवी पर भी काम किया और कई धारावाहिकों का हिस्सा बने। 2012 में 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' ने उन्हें बड़ी पहचान दिलाई। उनके अभिनय ने दर्शकों और फिल्म इंडस्ट्री दोनों का ध्यान खींचा। इसके बाद 'फुकरे', 'मसान', 'निल बट्टे सन्नाटा', 'बरेली की बर्फी', 'स्त्री' और 'लूडो' जैसी फिल्मों में उन्होंने विभिन्न प्रकार के किरदार निभाए। वेब सीरीज 'मिर्जापुर' और 'क्रिमिनल जस्टिस' ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया।
पंकज ने खुद को एक ही प्रकार के किरदारों तक सीमित नहीं रखा। कभी वह गंभीर भूमिकाओं में नजर आए, कभी खतरनाक किरदारों में और कभी ऐसे आम आदमी के रूप में, जिससे दर्शक तुरंत जुड़ गए। 'न्यूटन' के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला और 'मिमी' में उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का सम्मान प्राप्त हुआ। उनके खाते में दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हैं।
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