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पंकज उधास: एक गज़ल सम्राट की अनकही कहानी

पंकज उधास, भारतीय गज़ल के सम्राट, ने अपने संगीत सफर की शुरुआत 51 रुपये के पुरस्कार से की थी। उनका जन्म 17 मई 1951 को गुजरात में हुआ और उन्होंने कई संघर्षों के बाद गज़ल गायकी में अपनी पहचान बनाई। 'चिट्ठी आयी है' जैसे गाने ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया। उनकी आवाज आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और संगीत में उनके योगदान के बारे में।
 
पंकज उधास: एक गज़ल सम्राट की अनकही कहानी

पंकज उधास का संगीत सफर


मुंबई, 16 मई। भारतीय संगीत के क्षेत्र में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं, जो समय के साथ भी लोगों के दिलों में जीवित रहती हैं। इनमें से एक हैं प्रसिद्ध गज़ल गायक पंकज उधास। उनकी गज़लें हमेशा लोगों की भावनाओं को छूती थीं। उनकी गायकी में एक ऐसी मिठास थी, जो सीधे दिल में उतर जाती थी। इस महान गायक का सफर एक छोटे से मंच से और मात्र 51 रुपये के पुरस्कार से शुरू हुआ।


पंकज उधास का जन्म 17 मई 1951 को गुजरात के जेतपुर में एक जमींदार परिवार में हुआ। वह तीन भाइयों में सबसे छोटे थे, और उनके बड़े भाई मनहर उधास और निर्मल उधास पहले से ही संगीत के क्षेत्र में सक्रिय थे। घर में संगीत का माहौल होने के कारण, पंकज का झुकाव भी संगीत की ओर बचपन से ही था।


उन्होंने राजकोट की संगीत नाट्य अकादमी में तबला सीखना शुरू किया और बाद में शास्त्रीय संगीत की भी शिक्षा ली। पढ़ाई के साथ-साथ उनका ध्यान हमेशा संगीत पर केंद्रित रहा। उन्होंने मुंबई से विज्ञान में डिग्री प्राप्त की, लेकिन उनका असली सपना संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाना था।


उनकी जिंदगी का एक महत्वपूर्ण पल भारत-चीन युद्ध के दौरान आया, जब उनके बड़े भाई मनहर उधास का एक स्टेज शो चल रहा था। उस समय छोटे पंकज ने मंच पर 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाया। उनकी आवाज सुनकर एक दर्शक इतने भावुक हो गए कि उन्होंने पंकज को मंच पर ही 51 रुपये का पुरस्कार दिया। आज यह राशि छोटी लग सकती है, लेकिन उस समय यह उनके लिए बहुत बड़ी बात थी।


पंकज उधास ने कई इंटरव्यू में कहा कि वही 51 रुपये उनके जीवन का पहला सम्मान थे। संगीत की दुनिया में पहचान बनाना उनके लिए आसान नहीं था, और उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद 1972 में फिल्म 'कामना' से अपने करियर की शुरुआत की। हालांकि फिल्म सफल नहीं हुई, लेकिन उनकी आवाज ने लोगों का दिल जीत लिया। इसके बाद उन्होंने गज़ल गायकी की ओर कदम बढ़ाया और उर्दू सीखी ताकि गज़ल को सही तरीके से गा सकें।


1980 में उनका पहला गज़ल एल्बम 'आहट' रिलीज हुआ, जिसने उन्हें नई पहचान दी। इसके बाद 'तरन्नुम', 'महफिल' और 'नायाब' जैसे एल्बम आए, जिन्होंने उन्हें गज़ल की दुनिया में एक बड़ा नाम बना दिया। 1986 में फिल्म 'नाम' का गाना 'चिट्ठी आयी है' ने उन्हें रातोंरात स्टार बना दिया। यह गाना आज भी लोगों की आंखों में आंसू ला देता है।


पंकज उधास ने गज़ल के अलावा कई यादगार गाने भी गाए हैं, जैसे 'चांदी जैसा रंग है तेरा', 'ना कजरे की धार', 'थोड़ी थोड़ी पिया करो' और 'चुपके चुपके', जो आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें 2006 में पद्मश्री से सम्मानित किया, और बाद में मरणोपरांत पद्म भूषण से भी नवाजा गया।


26 फरवरी 2024 को पंकज उधास ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी आवाज आज भी लोगों के दिलों में जीवित है।


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