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नसीरुद्दीन शाह: संघर्ष से सफलता की कहानी, दिलीप कुमार की सलाह को किया नजरअंदाज!

नसीरुद्दीन शाह, भारतीय सिनेमा के एक प्रमुख अभिनेता, ने बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के अपने संघर्ष से सफलता की ऊंचाइयों को छुआ। दिलीप कुमार की सलाह को नजरअंदाज करते हुए, उन्होंने अपने अभिनय के सपने को पूरा किया। जानें उनके जीवन की प्रेरणादायक कहानी, जिसमें संघर्ष, मेहनत और अदाकारी की अनूठी मिसालें शामिल हैं।
 

नसीरुद्दीन शाह का अद्वितीय सफर




मुंबई, 19 जुलाई। भारतीय सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं में से एक नसीरुद्दीन शाह का नाम हमेशा लिया जाता है। उन्होंने बिना किसी फिल्मी पृष्ठभूमि के अपने प्रयासों से एक ऐसा स्थान बनाया है, जो हर कलाकार का सपना होता है। हालांकि, यह यात्रा आसान नहीं थी। एक समय था जब उन्होंने दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार से सलाह ली, जिन्होंने उन्हें घर लौटकर पढ़ाई करने की सलाह दी। लेकिन नसीर ने अपने हौसले को बनाए रखा और अपने निर्णय पर अडिग रहे।


नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ। उनका परिवार शिक्षा और अच्छी नौकरी को प्राथमिकता देता था। उनके पिता, अली मोहम्मद शाह, चाहते थे कि उनका बेटा भी अपने भाइयों की तरह एक सुरक्षित करियर चुने, लेकिन नसीर का झुकाव पढ़ाई से ज्यादा थिएटर और अभिनय की ओर था। बचपन से ही उन्हें क्रिकेट, फिल्में और नाटक पसंद थे।


अभिनय के प्रति अपने जुनून को पूरा करने के लिए, नसीरुद्दीन शाह ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। उनके इस निर्णय से उनके पिता नाराज हुए, क्योंकि परिवार चाहता था कि वह एक सुरक्षित करियर चुनें। लेकिन नसीर ने अपने सपने को प्राथमिकता दी। इसके बाद उन्होंने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में भी प्रशिक्षण लिया।


संघर्ष के दिनों में, नसीरुद्दीन शाह ने फिल्मों में छोटे-मोटे काम करना शुरू किया। 1967 में, उन्हें पहली बार फिल्म 'अमन' में काम मिला, जिसमें उन्होंने एक एक्स्ट्रा कलाकार के रूप में काम किया और इसके लिए उन्हें केवल 7.50 रुपए मिले। उस समय उनकी उम्र केवल 16 वर्ष थी।


इसी संघर्ष के दौरान, नसीरुद्दीन शाह की दिलीप कुमार से मुलाकात हुई। दिलीप कुमार उनके परिवार को जानते थे और नसीर ने उन्हें बहुत सम्मान दिया। जब नसीर ने कहा कि वह अभिनेता बनना चाहते हैं, तो दिलीप कुमार ने उन्हें पढ़ाई पर ध्यान देने की सलाह दी। यह सलाह नसीर के लिए चौंकाने वाली थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। बाद में, उन्होंने साबित किया कि अभिनय भी एक सम्मानजनक करियर हो सकता है।


नसीरुद्दीन शाह को असली पहचान 1975 में श्याम बेनेगल की फिल्म 'निशांत' से मिली। इसके बाद उन्होंने 'आक्रोश', 'स्पर्श', 'मंडी', 'अर्ध सत्य', 'मिर्च मसाला' और 'जाने भी दो यारों' जैसी फिल्मों में काम किया। उन्होंने समानांतर सिनेमा को नई पहचान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


धीरे-धीरे, नसीरुद्दीन शाह ने व्यावसायिक फिल्मों में भी अपनी जगह बनाई। 'कर्मा', 'मोहरा', 'सरफरोश', 'इकबाल', 'ए वेडनेसडे' और 'द डर्टी पिक्चर' जैसी फिल्मों में उनके विभिन्न किरदारों को दर्शकों ने सराहा। खास बात यह है कि उन्होंने हीरो, विलेन और गंभीर किरदारों में अपनी छाप छोड़ी।


उनकी अदाकारी के लिए उन्हें तीन बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म 'स्पर्श', 'पार' और 'इकबाल' के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इसके अलावा, भारत सरकार ने उन्हें 1987 में पद्मश्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।


फिल्मों के अलावा, नसीरुद्दीन शाह का थिएटर से भी गहरा संबंध रहा है। उन्होंने अपनी थिएटर संस्था के माध्यम से मंच को भी काफी समय दिया। टीवी पर 'मिर्जा गालिब' और 'भारत एक खोज' जैसे शोज में उनके अभिनय को भी सराहा गया।


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