जावेद अख्तर: 27 पैसे लेकर मुंबई पहुंचे, कैसे बने बॉलीवुड के मशहूर गीतकार?
जावेद अख्तर का संघर्ष और सफलता
मुंबई, 16 जनवरी। 'कभी जो ख्वाब था वो पा लिया है, मगर जो खो गई वो चीज क्या थी'... यह केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि जावेद अख्तर के लिए जीवन की सच्चाई है। उन्हें जादू के नाम से भी जाना जाता है, और यह नाम उनके लिए पूरी तरह से उपयुक्त है।
बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकार और लेखक जावेद अख्तर को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। उनके गीत और कविताएं लाखों दिलों को छू जाती हैं। एक समय ऐसा भी था जब जावेद अपने सपनों की नगरी मुंबई आए, और उनके पास केवल कुछ पैसे थे। यह स्थिति किसी के लिए कठिनाई का समय हो सकती थी, लेकिन उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया।
जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 को ग्वालियर में हुआ। बचपन में, वह अपने आस-पास की दुनिया से काफी प्रभावित थे। उनके दोस्त अमीर परिवारों से थे, जिनके पास महंगी घड़ियाँ और फाउंटेन पेन जैसी चीजें थीं। इनसे प्रेरित होकर, जावेद ने ठान लिया कि वह बड़े होकर अमीर बनेंगे। उनके परिवार का माहौल भी पढ़ाई और साहित्य के प्रति गहरी रुचि रखने वाला था। उनके पिता और दादा दोनों शायर थे, जिससे जावेद में शब्दों और शायरी का प्रेम बचपन से ही विकसित हुआ।
जावेद ने अपनी शिक्षा लखनऊ, अलीगढ़ और भोपाल में प्राप्त की। बचपन से ही उन्होंने साहित्य और कविता में रुचि दिखाई। उनका विश्वास था कि जीवन में कठिनाइयाँ आएंगी, लेकिन मेहनत और ईमानदारी से उन्हें पार किया जा सकता है। इसी सोच के साथ, वह मुंबई की ओर बढ़े।
1964 में, जावेद अख्तर मुंबई पहुंचे। इस शहर की चमक और फिल्म उद्योग का आकर्षण उनके लिए नए अवसर लेकर आया, लेकिन शुरुआत आसान नहीं थी। उनके पास केवल 27 पैसे थे। जावेद ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'जब मेरे पास इतना कम पैसा था, तब भी मेरा हौसला और आत्मविश्वास कम नहीं हुआ। मैंने ठान लिया था कि हर मुश्किल का सामना करूंगा और अपने सपनों को पूरा करूंगा।'
मुंबई में, जावेद ने कमाल अमरोही के स्टूडियो में कुछ दिन बिताए। कई रातें उन्होंने फुटपाथ पर बिताईं। शुरुआत में, उन्होंने सहायक निर्देशक के रूप में काम किया और कई बार हीरो के कपड़े और हीरोइन की सैंडल जैसी छोटी जिम्मेदारियाँ भी निभाईं। इन अनुभवों ने उन्हें सिनेमा की दुनिया को समझने का मौका दिया।
उनका करियर 'सरहदी लुटेरा' से शुरू हुआ। इसके बाद, उन्होंने सलीम खान के साथ मिलकर कई हिट फिल्में दीं। 'अंदाज', 'यादों की बारात', 'जंजीर', 'दीवार', 'हाथी मेरे साथी', और 'शोले' जैसी फिल्मों की पटकथा उनकी और सलीम की जोड़ी का कमाल थी। मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने आठ फिल्मफेयर पुरस्कार जीते। 1999 में, साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया।
जावेद अख्तर का जीवन केवल फिल्मों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने अपनी किताबों और कविताओं में अपने बचपन की यादें, संघर्ष और जीवन के अनुभव साझा किए। साहिर लुधियानवी और कमाल अमरोही जैसी हस्तियों के साथ उनके रिश्ते और सीखने का अनुभव उनके व्यक्तित्व का हिस्सा हैं। उनकी कहानी यह दर्शाती है कि कितनी भी कठिन परिस्थितियाँ हों, अगर हौसला और लगन हो, तो हर सपना पूरा किया जा सकता है।
आज, जावेद अख्तर बॉलीवुड के उन कलाकारों में शामिल हैं, जिनकी बातें, गीत और कविताएं पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनका वह दौर जब जेब में केवल 27 पैसे थे, अब लोगों के लिए हौसले और सपनों की मिसाल बन गया है।
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