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जगदीप: कॉमेडी के बादशाह की अनकही कहानी और उनकी विरासत

जगदीप, जिनका असली नाम इश्तियाक अहमद जाफरी है, ने हिंदी सिनेमा में एक अद्वितीय स्थान बनाया। उनका जीवन संघर्ष और सफलता की कहानी प्रेरणादायक है। जानें कैसे उन्होंने कॉमेडी की दुनिया में कदम रखा और अपनी कला की विरासत अपने परिवार को सौंपी। इस लेख में उनके करियर के महत्वपूर्ण मोड़ और यादगार किरदारों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।
 

जगदीप का प्रारंभिक जीवन और करियर की शुरुआत




मुंबई, 7 जुलाई। 'जगदीप', जिनका असली नाम इश्तियाक अहमद जाफरी है, का जन्म 29 मार्च 1939 को हुआ था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति उनके पिता की अचानक मृत्यु और 1947 के विभाजन के कारण बुरी तरह प्रभावित हुई।


कहा जाता है कि 1951 में, प्रसिद्ध निर्देशक बीआर चोपड़ा अपनी पहली फिल्म 'अफसाना' के लिए बाल कलाकारों की तलाश कर रहे थे। इश्तियाक, जो काम की तलाश में थे, को एक एजेंट मिला जिसने उन्हें एक नाटक में ताली बजाने के लिए 3 रुपए की पेशकश की।


जब मुख्य बाल कलाकार उर्दू संवाद बोलने में असफल रहे, इश्तियाक ने अपनी मूंछ-दाढ़ी लगाकर संवाद बोलने का जिम्मा लिया। उनके आत्मविश्वास से प्रभावित होकर बीआर चोपड़ा ने उनकी फीस बढ़ाकर 6 रुपए कर दी, और यहीं से इस अद्भुत अभिनेता की यात्रा शुरू हुई।


जगदीप की पहचान और सफलता

जगदीप ने अपने करियर की शुरुआत में एक गंभीर बाल कलाकार के रूप में पहचान बनाई। फिल्म 'फुटपाथ' (1953) में उन्होंने दिलीप कुमार के बचपन का किरदार निभाया, जिसके लिए दिलीप कुमार ने उन्हें 100 रुपए का पुरस्कार दिया। उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू भी उनकी फिल्म 'हम पंछी एक डाल के' (1957) से प्रभावित हुए।


उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब बिमल रॉय ने उन्हें 'दो बीघा जमीन' (1953) में कॉमिक रोल दिया। इसके बाद, जगदीप ने हमेशा के लिए कॉमेडी की दुनिया में कदम रखा।


1968 की फिल्म 'ब्रह्मचारी' ने उन्हें एक हास्य अभिनेता के रूप में स्थापित किया, लेकिन 1975 की फिल्म 'शोले' में 'सूरमा भोपाली' की भूमिका ने उन्हें अमर बना दिया।


जगदीप की विरासत

जगदीप ने 'पुराना मंदिर' (1984) में डाकू 'मच्छर सिंह' से लेकर प्रियदर्शन की 'मुस्कुराहट' (1992) में 'बद्रीप्रसाद चौरसिया' जैसे कई जटिल किरदार निभाए। उन्होंने अपनी कला की विरासत अपने बेटों, अभिनेता जावेद जाफरी और टेलीविजन निर्माता नावेद जाफरी, के साथ-साथ अपने पोते मीजान जाफरी को सौंपी।


दुर्भाग्यवश, गिरते स्वास्थ्य के कारण, इस महान कलाकार ने 8 जुलाई 2020 को मुंबई में अपने निवास पर अंतिम सांस ली।


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