गुलाम मुस्तफा खान: भारतीय संगीत के अनमोल रत्न की कहानी
संगीत की दुनिया में एक अद्वितीय नाम
मुंबई, 16 जनवरी। 3 मार्च 1931 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे गुलाम मुस्तफा खान का संगीत से गहरा नाता था, जो उनके जन्म से पहले ही तय हो चुका था। उनके पिता, उस्ताद वारिस हुसैन खान और दादा, इनायत हुसैन खान ने यह सुनिश्चित किया कि उनका बेटा घर की 'खलीफा' परंपरा को आगे बढ़ाए।
उस्ताद अक्सर याद करते थे कि जब अन्य बच्चे खेलते थे, तब वे अपने पिता के सामने घंटों 'खरज' का अभ्यास करते थे। उनके पिता संगीत के प्रति बेहद सख्त थे। एक बार उन्होंने कहा, "मेरे पिता मुझसे बहुत प्यार करते थे, लेकिन जब मैं रियाज करता, तो वे मुझे एक फौजी की तरह अनुशासित रखते थे।" यही अनुशासन उनके गले में वह 'तैयारी' लाया, जो आगे चलकर साढ़े तीन सप्तकों तक बिना थके चलती रही।
गायकी की अनोखी शैली
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान का घराना, 'रामपुर-सहसवान', हिंदुस्तानी संगीत का एक अनूठा स्थान है, जहां ग्वालियर घराने की स्थिरता और रामपुर के नवाबों की नफासत का संगम होता है। उनकी गायकी में 'नोम-तोम' का आलाप ध्रुपद की गंभीरता लाता था, और उनकी 'सपाट तानें' बिजली की चमक जैसी होती थीं।
बहुत कम लोग जानते हैं कि उस्ताद केवल एक परफॉर्मर नहीं थे, बल्कि एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले शोधकर्ता भी थे। उन्होंने आचार्य केसी देव बृहस्पति के साथ मिलकर 'जाति-गायन' जैसी प्राचीन भारतीय संगीत पद्धति पर काम किया, जो सदियों से किताबों में दबी हुई थी।
संगीत में योगदान
उन्होंने अपनी आवाज से यह सिद्ध किया कि भारतीय संगीत की 22 श्रुतियां कोई काल्पनिक अवधारणा नहीं हैं, बल्कि वास्तविकता हैं। उनके गाए 'सूक्ष्म स्वर-अंतराल' आज भी संगीत के छात्रों के लिए शोध का विषय बने हुए हैं।
शास्त्रीय गायकों में अक्सर यह दुविधा होती थी कि वे फिल्मों के लिए गाएं या नहीं, लेकिन खान साहब ने इस दीवार को तोड़ दिया। 1981 की फिल्म 'उमराव जान' में उनकी गाई 'रागमाला' आज भी संगीत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है। जब वे गाते हैं, "प्रथम धर ध्यान..." (भैरव) से लेकर "दर्शन देहो शंकर महादेव..." (यमन) तक, तो श्रोता एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव में खो जाता है।
शिक्षा और विरासत
उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान की सबसे बड़ी विरासत उनके शिष्य हैं। उन्हें 'वॉइस कल्चर' का सबसे बड़ा विशेषज्ञ माना जाता था। लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी महान हस्तियों ने आवाज की बारीकियों के लिए उनसे मार्गदर्शन लिया। एआर रहमान ने उनके चरणों में बैठकर शास्त्रीय संगीत की बारीकियां सीखी। सोनू निगम उन्हें अपना 'आध्यात्मिक पिता' मानते हैं।
भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री (1991), पद्म भूषण (2006) और पद्म विभूषण (2018) से सम्मानित किया, लेकिन उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार उनके शिष्यों की सफलता और वह 'दाद' थी जो उन्हें दुनियाभर के मंचों पर मिली।
अंतिम विदाई
17 जनवरी 2021 को मुंबई में इस महान कलाकार ने अंतिम सांस ली। 89 वर्ष की आयु में जब उन्होंने इस दुनिया को छोड़ा, तो अपने पीछे चार बेटों (मुर्तुजा, कादिर, रब्बानी और हसन) और पोतों की एक पूरी फौज छोड़ गए, जो आज भी उसी शुद्धता से गा रहे हैं। 'उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान अकादमी' और उनकी स्मृति में शुरू की गई 'आईसीसीआर फेलोशिप' इस बात का प्रमाण है कि एक सच्चा कलाकार कभी नहीं मरता।
उस्ताद गुलाम मुस्तफा एक ऐसे 'पुल' थे जिन्होंने बीते हुए कल की शास्त्रीय कठोरता को आज के युवाओं की सुरीली चाहत से जोड़ा।
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