गुलजार: एक साधारण जीवन से लेकर सिनेमा के महानायक तक का सफर
गुलजार का अद्भुत सफर
मुंबई, 17 अगस्त। जब भी गुलजार का नाम लिया जाता है, तो खूबसूरत शायरी, दिल को छू लेने वाले गाने और ऐसी कहानियां याद आती हैं, जो भावनाओं को बखूबी व्यक्त करती हैं। आज गुलजार हिंदी सिनेमा और साहित्य के एक प्रमुख नाम बन चुके हैं, लेकिन उनका सफर किसी फिल्मी परिवार से शुरू नहीं हुआ।
एक समय ऐसा भी था जब उन्हें मुंबई में जीवन यापन के लिए गैराज में काम करना पड़ा और वह कारों पर पेंटिंग करते थे। शायद उस समय उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनकी लिखी पंक्तियां एक दिन विश्वभर में प्रसिद्ध होंगी। उनके जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब निर्देशक बिमल रॉय ने उनकी प्रतिभा को पहचाना।
गुलजार का जन्म 18 अगस्त 1934 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के दीना में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। उनका असली नाम संपूरण सिंह कालरा है। भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद उन्हें अपने परिवार से अलग होना पड़ा और कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बाद वह मुंबई आए और एक मोटर गैराज में काम करने लगे। उस समय उनके पास पैसे की कमी थी, लेकिन लिखने और पढ़ने का शौक उनके साथ बना रहा।
गुलजार की बिमल रॉय से मुलाकात गीतकार शैलेंद्र के माध्यम से हुई। उस समय बिमल रॉय 'बंदिनी' पर काम कर रहे थे। उन्होंने गुलजार की सोच और लेखन क्षमता को पहचाना और उन्हें गैराज की नौकरी छोड़ने के लिए प्रेरित किया। गुलजार ने एक इंटरव्यू में बताया कि बिमल रॉय ने उनसे कहा था कि वह वापस गैराज में न जाएं, क्योंकि यह उनकी जिंदगी बर्बाद कर देगा। यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था, क्योंकि किसी बड़े फिल्मकार ने पहली बार उनके भीतर के लेखक को पहचाना था।
इसके बाद गुलजार ने बिमल रॉय के साथ काम करना शुरू किया। 'बंदिनी' 1963 में रिलीज हुई और इसी फिल्म से गुलजार ने गीतकार के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। इस फिल्म के संगीतकार एस.डी. बर्मन थे, और गुलजार ने इसके लिए 'मोरा गोरा अंग लई ले' गीत लिखा, जिसे लता मंगेशकर ने गाया।
इसके बाद गुलजार का करियर लगातार ऊंचाइयों की ओर बढ़ता गया। उन्होंने गीतकार के साथ-साथ पटकथा और संवाद लेखक के रूप में भी काम किया। बाद में उन्होंने खुद फिल्में बनानी शुरू कीं। 1971 में 'मेरे अपने' से उन्होंने निर्देशन की शुरुआत की। इसके बाद 'कोशिश', 'अचानक', 'मौसम', 'आंधी', 'खुशबू', 'किताब' और 'नमकीन' जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी फिल्मों में रिश्तों, अकेलेपन और आम जिंदगी की छोटी-छोटी भावनाओं को विशेष रूप से दर्शाया गया।
गुलजार की लेखनी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गाने दिए। उन्होंने विभिन्न संगीतकारों के साथ काम किया और बाद में एआर रहमान के साथ उनकी जोड़ी भी बेहद सफल रही। फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनेयर' के गीत 'जय हो' ने उन्हें वैश्विक पहचान दिलाई। इस गीत के लिए गुलजार और एआर रहमान ने 2009 में ऑस्कर जीता। अगले वर्ष 'जय हो' को ग्रैमी अवॉर्ड भी मिला।
गुलजार की उपलब्धियां केवल फिल्मों तक सीमित नहीं हैं। उन्हें 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 2004 में पद्म भूषण और 2013 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 2024 में उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मानों में से एक, ज्ञानपीठ पुरस्कार भी प्राप्त होगा। उनके पास कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार भी हैं।
गुलजार की निजी जिंदगी भी अक्सर चर्चा में रही है। उन्होंने अभिनेत्री राखी से विवाह किया और उनकी बेटी मेघना गुलजार हैं, जो खुद एक सफल फिल्म निर्देशक हैं।
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