क्या बदल गई है बॉलीवुड में हीरो की परिभाषा? जानें फिल्म फेस्टिवल में क्या कहा गया
बॉलीवुड में बदलाव की कहानी
नई दिल्ली, 3 जनवरी। 'राजा हरिश्चंद्र' भारतीय सिनेमा की पहली मूक फिल्म मानी जाती है, जिसमें नायक एक सच्चे, मेहनती और संस्कारी व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया था। लेकिन आज के सिनेमा में नायकों और नायिकाओं की छवि में काफी बदलाव आ चुका है।
बॉलीवुड में हिंदू धर्म को अक्सर हल्के में लिया जाता है, जिसके चलते फिल्मों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होते रहते हैं। इस विषय पर दिल्ली में आयोजित शब्दोत्सव फिल्म फेस्टिवल के क्यूरेटर प्रशांत कश्यप ने चर्चा की कि यह बदलाव कब से शुरू हुआ।
शब्दोत्सव में सिनेमा और हिंदू धर्म पर बात करते हुए प्रशांत कश्यप ने कहा कि पहले फिल्में संस्कारों पर आधारित होती थीं, लेकिन अब समय के साथ यह सब बदल गया है। उन्होंने यह भी बताया कि क्यों फिल्मों में हिंदू धर्म और देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया जाता है।
प्रशांत ने कहा कि पहले भारतीय संस्कारों से प्रेरित होकर फिल्में बनाई जाती थीं और किरदार हमारे ग्रंथों से प्रेरित होते थे, जैसे कि 'राजा हरिश्चंद्र'। 70 के दशक से पहले के किरदार मर्यादा में रहते थे, जो ईमानदार और सच्चे होते थे। 'राजा हरिश्चंद्र' में भी यही दिखाया गया है, लेकिन 70 के दशक ने सब कुछ बदल दिया।
उन्होंने आगे बताया कि पहले अभिनेत्रियों की प्रेरणा मां सीता से ली जाती थी, जो मुखर और मर्यादित थीं, लेकिन 70 के दशक के बाद हीरो की परिभाषा में बदलाव आया। अब हीरो डॉन बन गए हैं। दर्शकों को यह बताया गया कि जो मर्यादा में नहीं है, वही असली हीरो है, जो गुंडा होगा और मंदिर में जाकर भगवान से पूछेगा, 'आज तो तुम बहुत खुश होगे।' इस तरह धर्म और संस्कारों का मजाक बना दिया गया है।
वहीं, हिंदी सिनेमा में आए बदलाव पर फिल्म निर्देशक अश्विन कुमार ने कहा कि आज की फिल्मों में विलेन को आदर्श मानने का चलन बढ़ गया है, जैसे कि फिल्म 'धुरंधर' में अक्षय खन्ना का किरदार। अब दर्शक हीरो की तुलना में विलेन को अधिक पसंद करने लगे हैं, जो समाज के लिए खतरा बनता जा रहा है।
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