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क्या फिल्म इंडस्ट्री में क्रू मेंबर्स की मेहनत को नजरअंदाज किया जा रहा है? चित्रांगदा सिंह ने उठाया सवाल

अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने फिल्म इंडस्ट्री में क्रू मेंबर्स की मेहनत को नजरअंदाज करने पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि सेट पर काम करने वाले तकनीकी स्टाफ और वर्कर्स की थकान को ध्यान में रखा जाना चाहिए। चित्रांगदा ने सुझाव दिया कि एक्टर्स को इस मुद्दे को उठाना चाहिए ताकि पूरे क्रू के लिए बेहतर काम के घंटे सुनिश्चित किए जा सकें। उनका मानना है कि इससे न केवल क्रू का स्वास्थ्य बेहतर होगा, बल्कि फिल्म निर्माण की गुणवत्ता भी बढ़ेगी। जानें उनके विचार और सुझाव इस लेख में।
 
क्या फिल्म इंडस्ट्री में क्रू मेंबर्स की मेहनत को नजरअंदाज किया जा रहा है? चित्रांगदा सिंह ने उठाया सवाल

फिल्म इंडस्ट्री में क्रू मेंबर्स की अहमियत


मुंबई, 5 जनवरी। फिल्म उद्योग में किसी प्रोजेक्ट की सफलता का श्रेय अक्सर कलाकारों और निर्माताओं को दिया जाता है, लेकिन कैमरे के पीछे काम करने वाले लोग, जैसे कि लाइटिंग, आर्ट और सेट वर्कर्स, भी फिल्म निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनकी मेहनत और समय को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। इस विषय पर अभिनेत्री चित्रांगदा सिंह ने अपनी राय व्यक्त की और कहा कि अब समय आ गया है कि इस चर्चा में केवल एक्टर्स नहीं, बल्कि पूरे क्रू को शामिल किया जाए।


चित्रांगदा ने मीडिया से बातचीत में कहा, 'फिल्म सेट पर शिफ्ट टाइमिंग को नियंत्रित करना सभी के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। एक्टर्स के लिए सुविधाएं उपलब्ध होती हैं, लेकिन टेक्निकल स्टाफ और सेट वर्कर्स को लंबे समय तक काम करना पड़ता है। यदि शूटिंग सुबह 9 बजे शुरू होती है, तो एक्टर्स 7 बजे आते हैं, जबकि सेट के लोग सुबह 5 या 5:30 बजे से काम शुरू कर देते हैं।'


उन्होंने आगे कहा, 'इनकी थकान को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। सेट पर लंबी यात्रा और सीमित ट्रांसपोर्ट विकल्प भी इनकी थकान को बढ़ाते हैं। कई बार ये लोग शूटिंग के दौरान ही थककर सो जाते हैं। इसलिए नियमित और उचित शिफ्ट टाइमिंग देना बहुत जरूरी है। यह न केवल उनके स्वास्थ्य के लिए, बल्कि पूरे प्रोडक्शन की सफलता के लिए भी फायदेमंद है।'


चित्रांगदा ने कहा, 'एक्टर्स को इस बदलाव के लिए आगे आना चाहिए। यदि वे इस मुद्दे को उठाते हैं और क्रू के लिए बेहतर समय की मांग करते हैं, तो यह फिल्म इंडस्ट्री में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। इससे यह सिर्फ एक्टर्स का नहीं, बल्कि पूरे उद्योग का मुद्दा बन जाएगा।'


कुछ लोग मानते हैं कि काम के घंटे तय करने से क्रिएटिविटी प्रभावित होगी। इस पर चित्रांगदा ने कहा, 'बेहतर और नियमित समय होने से सभी लोग अधिक कुशल बन सकते हैं। जब लोग थके हुए नहीं होंगे, तब उनकी क्रिएटिविटी और काम की गुणवत्ता भी बेहतर होगी।'


अंत में, चित्रांगदा ने कहा, 'फिल्म इंडस्ट्री में लचीलापन होना आवश्यक है। स्क्रिप्ट लेखन और संपादन जैसी प्रक्रियाएं अक्सर देर रात तक चलती हैं। इसलिए इसे कॉर्पोरेट नौकरी की तरह नियमों में बांधना मुश्किल है। स्थिति के अनुसार समझदारी भरा निर्णय लेना सबसे अच्छा तरीका है।'


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