क्या जानते हैं आप? मणिरत्नम की फिल्मी यात्रा की अनकही कहानी!
मणिरत्नम: भारतीय सिनेमा के दिग्गज
मुंबई, 1 जून। भारतीय सिनेमा के प्रसिद्ध निर्देशक मणिरत्नम की फिल्मों का दर्शकों को हमेशा बेसब्री से इंतजार रहता है। कई प्रमुख कलाकार उनके साथ काम करने को अपने करियर की एक बड़ी उपलब्धि मानते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि बचपन में उनका फिल्मों के प्रति कोई खास रुचि नहीं थी।
एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्हें लगता था कि फिल्में समय की बर्बादी हैं। यह बात उनकी कहानी को और भी दिलचस्प बनाती है, क्योंकि जिस व्यक्ति को कभी फिल्मों में रुचि नहीं थी, वही आगे चलकर भारतीय सिनेमा का एक बड़ा नाम बन गया।
मणिरत्नम का जन्म 2 जून 1956 को तमिलनाडु के मदुरै में हुआ। उनका असली नाम गोपालरत्नम सुब्रमण्यम है। उनका परिवार फिल्म उद्योग से जुड़ा हुआ था; उनके पिता एस. गोपालरत्नम फिल्म वितरण में थे और उनके चाचा वीनस कृष्णमूर्ति एक फिल्म निर्माता थे। हालांकि, घर में फिल्मी माहौल होने के बावजूद, मणिरत्नम का ध्यान पढ़ाई और अन्य विषयों पर अधिक था।
अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद, मणिरत्नम ने मुंबई से एमबीए किया। पढ़ाई के बाद उन्होंने एक कंपनी में प्रबंधन सलाहकार के रूप में काम किया। उस समय उनका फिल्म इंडस्ट्री में आने का कोई विचार नहीं था। कॉलेज के दिनों में उन्होंने विभिन्न प्रकार की फिल्में देखनी शुरू कीं, जिससे उनकी सिनेमा में रुचि बढ़ने लगी।
उनकी जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब उनके दोस्त रवि शंकर एक फिल्म पर काम कर रहे थे। इस दौरान मणिरत्नम ने फिल्म की कहानी और पटकथा लिखने में मदद की, जिससे उन्हें फिल्म निर्माण की प्रक्रिया को समझने का अवसर मिला। बाद में उन्होंने कन्नड़ फिल्म 'पल्लवी अनु पल्लवी' से निर्देशन की दुनिया में कदम रखा। यह उनकी पहली फिल्म थी, जिसने उन्हें शुरुआती पहचान दिलाई। हालांकि, कुछ फिल्मों ने अपेक्षित सफलता नहीं पाई।
1986 में आई तमिल फिल्म 'मौना रागम' ने उनकी किस्मत बदल दी। इस फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों ने सराहा। इसके बाद मणिरत्नम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 'नायकन', 'अंजलि', 'थलपति', 'रोजा', 'बॉम्बे', 'दिल से', 'कन्नाथिल मुथामित्तल', 'युवा', 'गुरु' और 'पोन्नियिन सेल्वन' जैसी कई यादगार फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों में प्रेम कहानियों के साथ-साथ समाज, राजनीति, आतंकवाद, सांप्रदायिकता और मानवीय रिश्तों जैसे विषय शामिल होते हैं।
मणिरत्नम ने फिल्म 'रोजा' के जरिए ए.आर. रहमान को बतौर संगीत निर्देशक एक बड़ा मौका दिया, और यह जोड़ी भारतीय सिनेमा की सबसे सफल जोड़ियों में से एक बन गई।
अपने अद्वितीय योगदान के लिए मणिरत्नम को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिनमें सात राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और अंतरराष्ट्रीय सम्मान शामिल हैं। 2002 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से नवाजा।
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