Movie prime

क्या H-1B वीजा विवाद भारतीय पेशेवरों के भविष्य को प्रभावित करेगा?

अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर नया विवाद उठ खड़ा हुआ है, जिसमें उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने विदेशी कर्मचारियों को 'बंधुआ मजदूर' कहा है। भारत ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, यह बताते हुए कि भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इस विवाद ने तकनीकी कंपनियों की भर्ती नीतियों और स्थानीय रोजगार पर बहस को तेज कर दिया है। जानें इस मुद्दे पर भारत का क्या कहना है और भविष्य में H-1B वीजा कार्यक्रम में संभावित बदलावों का भारतीय पेशेवरों पर क्या असर पड़ सकता है।
 

H-1B वीजा पर नया विवाद

अमेरिका में H-1B वीजा को लेकर एक बार फिर से विवाद उत्पन्न हो गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इस वीजा कार्यक्रम के तहत काम करने वाले विदेशी कर्मचारियों को 'बंधुआ मजदूर' करार देते हुए कंपनियों की भर्ती नीतियों पर सवाल उठाए हैं। भारत ने इस बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि प्रवासी श्रमिकों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और भारतीय पेशेवरों का योगदान अमेरिका की आर्थिक प्रगति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस विवाद ने अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों की भूमिका, स्थानीय रोजगार और तकनीकी कंपनियों की भर्ती नीतियों पर बहस को तेज कर दिया है। H-1B वीजा भारतीय आईटी पेशेवरों के लिए अमेरिका में काम करने का एक प्रमुख साधन रहा है, इसलिए इस कार्यक्रम में होने वाले किसी भी बदलाव का सीधा असर भारतीय कर्मचारियों और कंपनियों पर पड़ सकता है।


भारत ने पेशेवरों के योगदान पर जोर दिया


भारत के विदेश मंत्रालय ने वेंस के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि प्रवासियों का योगदान अमेरिकी अर्थव्यवस्था के विकास में महत्वपूर्ण रहा है। भारतीय पेशेवर नई तकनीक, अनुसंधान, नवाचार और रोजगार सृजन जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारत का कहना है कि भारतीय कर्मचारियों की विशेषज्ञता से केवल अमेरिका को ही लाभ नहीं होता, बल्कि दोनों देशों के बीच आर्थिक और तकनीकी सहयोग भी मजबूत होता है। H-1B वीजा कार्यक्रम के तहत बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक अमेरिका में रोजगार प्राप्त करते हैं, और आंकड़ों के अनुसार, इस वीजा के लाभार्थियों में भारतीयों की हिस्सेदारी लगभग 71 प्रतिशत है।


जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर गंभीर आरोप लगाए

जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट पर H-1B वीजा व्यवस्था का दुरुपयोग करने का आरोप लगाया। उनके अनुसार, कंपनी ने पिछले एक साल में लगभग 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी से निकाला, जबकि इसी दौरान उसे लगभग 6,300 H-1B वीजा और करीब 3,000 ग्रीन कार्ड का लाभ मिला। वेंस ने सवाल उठाया कि जब अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है, तो कंपनियों को विदेशी कर्मचारियों की भर्ती को प्राथमिकता क्यों देनी चाहिए। उन्होंने इस व्यवस्था को शर्मनाक बताते हुए इसमें बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया। हालांकि, माइक्रोसॉफ्ट ने अपने वीजा आवेदनों का बचाव किया है, यह कहते हुए कि लगभग 80 प्रतिशत H-1B आवेदन पहले से काम कर रहे कर्मचारियों के लिए थे।


H-1B और ग्रीन कार्ड में अंतर

H-1B एक गैर-आप्रवासी वीजा है, जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां विशेष कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नौकरी पर रख सकती हैं। तकनीक, इंजीनियरिंग और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवर इस कार्यक्रम का व्यापक उपयोग करते हैं। वहीं, PERM यानी परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया का एक हिस्सा है। इसके तहत नियोक्ता को कुछ शर्तें पूरी करनी होती हैं, ताकि विदेशी कर्मचारी को स्थायी निवास दिलाने की प्रक्रिया आगे बढ़ सके। भारत के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कुछ कंपनियों के PERM आवेदनों पर रोक लगने से मौजूदा H-1B वीजा अपने आप अमान्य नहीं होते।


भारतीय पेशेवरों के भविष्य पर नजर

इस विवाद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिकी वीजा नीतियों में सख्ती का भारतीय पेशेवरों पर कितना असर पड़ेगा। H-1B कार्यक्रम में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी होने के कारण किसी भी नीतिगत बदलाव का प्रभाव हजारों कर्मचारियों और उनके परिवारों पर पड़ सकता है। भारत ने अपने रुख में यह स्पष्ट किया है कि कुशल पेशेवरों की आवाजाही से दोनों देशों को लाभ होता है। दूसरी ओर, अमेरिकी प्रशासन अमेरिकी नागरिकों के रोजगार की सुरक्षा और वीजा नियमों के कथित दुरुपयोग को रोकने पर जोर दे रहा है। अब इस विवाद में आगे के नीतिगत फैसलों पर नजर रहेगी।


OTT