कौन हैं अनजान? जानें बॉलीवुड के मशहूर गीतकार की अनकही कहानी
अनजान: एक अद्वितीय गीतकार की यात्रा
मुंबई, 12 सितंबर। बॉलीवुड के स्वर्णिम युग के प्रमुख गीतकारों में से एक, अनजान ने अपनी लेखनी से आम बोलचाल की भाषा को अमर बना दिया। बनारस के घाटों से लेकर मुंबई तक का सफर तय करने वाले अनजान का असली नाम लालजी पांडेय था। उन्होंने 13 सितंबर 1977 को इस दुनिया को अलविदा कहा।
अनजान का जन्म 28 अक्टूबर 1930 को वाराणसी के ओदार गांव में हुआ। उनके पिता का नाम शिवनाथ पांडेय और माता का नाम इंदिरा देवी था। बनारस में बीएचयू से एम.कॉम की डिग्री हासिल करने के बाद, उन्हें कविता और शायरी का शौक था। उनके दोस्तों ने उन्हें 'अनजान' नाम दिया, और उनकी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगीं।
एक संगीत कार्यक्रम में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध गायक मुकेश से हुई, जिन्होंने उन्हें मुंबई जाने की सलाह दी। 1951 में अनजान मुंबई पहुंचे, लेकिन शुरुआत में उन्हें फिल्मों में काम नहीं मिला। खर्च चलाने के लिए उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया और कई रातें लोकल ट्रेन या अपार्टमेंट की सीढ़ियों के नीचे बिताईं।
1953 में, उन्होंने प्रेमनाथ प्रोडक्शन की फिल्म 'प्रिजनर ऑफ गोलकुंडा' के लिए 'लहर ये डोले कोयल बोले' और 'शहीदों अमर है तुम्हारी कहानी' जैसे गीत लिखे। अनजान को सफलता पाने में लगभग 20 साल लगे। 1960 के दशक में, जी.एस. कोहली के साथ 'लंबे हाथ' फिल्म का गाना 'मत पूछ मेरा है मेरा कौन वतन' काफी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद, 1963 में पंडित रविशंकर के संगीत में 'गोदान' के गीत 'चली आज गोरी पिया की नगरिया' ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई।
अनजान ने ओ.पी. नैयर के साथ 'बहारे फिर भी आईं' में 'आप के हसीन रुख' और जी.पी. सिप्पी की 'बंधन' में 'बिना बादरा के बिजुरिया कैसे बरसे' जैसे गाने लिखे। उन्होंने कई बड़े संगीतकारों के साथ काम किया और 1970 के दशक में भोजपुरी फिल्मों के लिए भी गीत लिखे, जिसमें 'गोरकी पतरकी रे' शामिल है।
अमिताभ बच्चन की फिल्मों में उनके गीतों ने उन्हें सबसे अधिक पहचान दिलाई। 'डॉन' का 'खइके पान बनारस वाला', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस', और 'रोटी कपड़ा और मकान' जैसे कालजयी गीतों के साथ, अनजान ने 70-80 के दशक में हिंदी सिनेमा के संगीत को नया मोड़ दिया। उन्होंने 300 से अधिक फिल्मों के लिए 1500 से ज्यादा गीत लिखे।
लगभग 20 वर्षों तक हिंदी फिल्मों में अनजान एक सफल ऑलराउंडर रहे, लेकिन उनकी कविताओं में भोजपुरी भाषा और उत्तर प्रदेश की संस्कृति की झलक मिलती थी। उनके बेटे समीर के अनुसार, यही कारण है कि वे 'खाईके पान' और 'बिना बदरा के बिजुरिया' जैसे गीतों को इतनी कुशलता से लिख सके। उनकी पसंदीदा रचनाओं में 'मानो तो मैं गंगा मां हूं' और 'चल मुसाफिर' शामिल हैं। 13 सितंबर 1997 को उनकी मृत्यु से कुछ महीने पहले, अमिताभ बच्चन ने उनकी एकमात्र कविता संग्रह 'गंगा तथा का बंजारा' का विमोचन किया।
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