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कौन थे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां? जानें उनकी अनोखी संगीत यात्रा

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, जिनकी आवाज़ ने भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, का जन्म 1902 में हुआ। पटियाला घराने के इस महान गायक ने अपने अद्वितीय गायन से श्रोताओं के दिलों में एक खास जगह बनाई। उन्होंने 'मुगल-ए-आजम' में तानसेन के किरदार के लिए गाने का प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसके लिए उन्होंने 25,000 रुपये की फीस मांगी। उनके गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। जानें उनके जीवन और संगीत यात्रा के बारे में।
 
कौन थे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां? जानें उनकी अनोखी संगीत यात्रा

उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का संगीत सफर




नई दिल्ली, 24 अप्रैल। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, जिनकी आवाज़ ने 'याद पिया की आए' और 'नैना मोरे तारास गाये' जैसे गानों को अमर बना दिया, भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अद्वितीय नाम हैं। पटियाला घराने के इस महान गायक ने अपनी अद्भुत आवाज और भावपूर्ण प्रस्तुतियों से श्रोताओं के दिलों में एक खास जगह बनाई। उनका निधन 25 अप्रैल 1968 को हुआ, लेकिन उनके गाने आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं।


बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 को पाकिस्तान के कसूर में हुआ। उनका परिवार संगीत में गहराई से जुड़ा था, उनके पिता अली बख्श खां और चाचा काले खां भी प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। बचपन से ही उन्हें संगीत की शिक्षा मिली, जिसने उनके करियर की नींव रखी।


उस्ताद ने अपना जीवन लाहौर, बम्बई, कोलकाता और हैदराबाद में बिताया। उनके शिष्य, प्रसिद्ध गजल गायक गुलाम अली, भी संगीत की इस दुनिया में उनके योगदान को मानते हैं। बड़े गुलाम अली खां ने सारंगी वादक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और बाद में अपने परिवार के अन्य संगीतज्ञों से संगीत की शिक्षा ली।


1919 में लाहौर संगीत सम्मेलन में उन्होंने पहली बार अपनी कला का प्रदर्शन किया, जिसके बाद कोलकाता और इलाहाबाद के संगीत सम्मेलनों ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई। उनकी आवाज़ और अभिनव शैली ने ठुमरी को एक नया रूप दिया, जिसमें लोक संगीत की मिठास थी।


उस्ताद बड़े गुलाम अली खां ने ध्रुपद, ग्वालियर और जयपुर घराने की शैलियों का सुंदर मिश्रण किया। महात्मा गांधी ने उनके भजन 'राधेश्याम बोल' को सुनकर उनकी कला की सराहना की। उन्होंने फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में तानसेन के किरदार के लिए गाने का प्रस्ताव स्वीकार किया, जिसके लिए उन्होंने 25,000 रुपये की फीस मांगी।


1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद, वे कुछ समय के लिए पाकिस्तान गए, लेकिन बाद में भारत लौट आए। उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और जीवन के अंतिम वर्षों तक संगीत की सेवा की। उन्हें 1962 में पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


बड़े गुलाम अली खां का निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हुआ। अपने बेटे मुनव्वर अली खान के साथ, वे अपनी मृत्यु तक संगीत के प्रति समर्पित रहे।


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