ओम पुरी की संघर्ष की कहानी: कैसे उन्होंने अंग्रेजी में महारत हासिल की?
ओम पुरी का अंग्रेजी से संघर्ष
मुंबई, 17 जून। प्रसिद्ध अभिनेता ओम पुरी ने एक बार साझा किया था कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में उनके लिए अंग्रेजी भाषा एक बड़ी चुनौती थी।
ओम पुरी ने अनुपम खेर के शो 'द अनुपम खेर शो- कुछ भी हो सकता है' में अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा, "एनएसडी में मुझे अंग्रेजी बोलने में काफी कठिनाई होती थी, क्योंकि मैंने अपनी पढ़ाई पंजाबी माध्यम से की थी, जबकि वहां अंग्रेजी में पढ़ाई होती थी। कुछ सहपाठी कॉन्वेंट से थे, जिनकी अंग्रेजी बहुत अच्छी थी, जिससे मुझे हीन भावना महसूस होती थी।"
उन्होंने बताया कि जब एनएसडी के निदेशक इब्राहिम अलकाजी को उनकी समस्या का पता चला, तो उन्होंने अन्य छात्रों से कहा कि वे ओम पर ध्यान दें।
जब ओम ने स्वीकार किया कि वे अंग्रेजी में उतने अच्छे नहीं हैं, तो अलकाजी ने उन्हें सलाह दी कि अगर वे सहज महसूस करते हैं, तो हिंदी में बोलें।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि अंग्रेजी सुधारने के लिए अखबार पढ़ना और दोस्तों के साथ अंग्रेजी में बातचीत करना जरूरी है। उन्होंने कहा, "लोग हंस सकते हैं, लेकिन चिंता मत करो।"
अपनी प्रारंभिक शिक्षा के बाद, ओम पुरी ने एनएसडी में दाखिला लिया। उनके सहपाठी नसीरुद्दीन शाह ने उन्हें पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) में दाखिला लेने के लिए प्रेरित किया।
ओम पुरी ने अपने करियर की शुरुआत 1976 की मराठी फिल्म 'घासीराम कोतवाल' से की, जो विजय तेंदुलकर के नाटक पर आधारित थी।
उन्होंने कई भाषाओं में काम किया, जिनमें अंग्रेजी, पंजाबी, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम, बंगाली, गुजराती, उर्दू और मराठी शामिल हैं।
उनकी प्रमुख फिल्मों में 'आक्रोश' (1980), 'आरोहण' (1982), 'अर्धसत्य' (1983), 'डिस्को डांसर' (1982), 'जाने भी दो यारो' (1983), 'चाची 420' (1997), 'हेराफेरी' (2000) और 'चुप चुप के' (2006) शामिल हैं।
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