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उस्ताद अल्ला रक्खा खां: तबला वादन के महानायक की अनकही कहानी

उस्ताद अल्ला रक्खा खां, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला वादन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया, का जन्म 29 अप्रैल 1919 को जम्मू-कश्मीर में हुआ। उन्होंने 12 साल की उम्र में संगीत की साधना शुरू की और पंडित रवि शंकर के साथ मंच साझा कर अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई। उनकी शिक्षा और उपलब्धियों ने उन्हें तबला वादन का महानायक बना दिया। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और उनके बेटे उस्ताद जाकिर हुसैन की विरासत के बारे में।
 
उस्ताद अल्ला रक्खा खां: तबला वादन के महानायक की अनकही कहानी

तबला वादन में क्रांति लाने वाले उस्ताद अल्ला रक्खा खां


नई दिल्ली, 28 अप्रैल। भारतीय शास्त्रीय संगीत में तबला वादन को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाले उस्ताद अल्ला रक्खा खां ने केवल 12 साल की उम्र में इस कला में खुद को समर्पित कर दिया था। 1960 के दशक में, उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली जब उन्होंने पंडित रवि शंकर के साथ मंच साझा किया।


उस्ताद अल्ला रक्खा का जन्म 29 अप्रैल 1919 को जम्मू-कश्मीर के घगवाल गांव में एक मुस्लिम डोगरा परिवार में हुआ। संगीत के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही था, हालांकि उनके परिवार ने संगीत में करियर बनाने के खिलाफ थे। लेकिन उन्होंने अपने परिवार की इच्छाओं के विपरीत संगीत की राह चुनी।


उन्होंने पंजाब घराने के उस्ताद मियां कादिर बख्श से शिक्षा ली और तबले के साथ-साथ पखावज भी बजाया। जल्द ही, वे ऑल इंडिया रेडियो के पहले एकल तबला वादक बन गए। उनकी तबला वादन की विशेषताएं थीं: ताल पर अद्भुत नियंत्रण, तेज गति की बोलियां और भावपूर्ण प्रस्तुति।


उस्ताद अल्ला रक्खा खां को विश्व स्तर पर तबला को पहचान दिलाने का श्रेय पंडित रवि शंकर के साथ उनकी जोड़ी को जाता है। 1960 के दशक में, उनके साथ जुगलबंदी ने यूरोप और अमेरिका में भारतीय शास्त्रीय संगीत की लहर पैदा की। मॉन्टेरी पॉप फेस्टिवल और वुडस्टॉक जैसे मंचों पर उनकी थापों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।


उन्होंने तबले को केवल संगत वाद्य नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र एकल वाद्य के रूप में स्थापित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कई शास्त्रीय कलाकारों के साथ काम किया और 1985 में मुंबई में अल्ला रक्खा इंस्टीट्यूट ऑफ म्यूजिक की स्थापना की, जहां उन्होंने सैकड़ों छात्रों को प्रशिक्षित किया। उनके बेटे उस्ताद जाकिर हुसैन आज तबला की दुनिया में एक सुपरस्टार हैं और अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।


उस्ताद अल्ला रक्खा खां को 1977 में पद्मश्री और 1982 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका निधन 3 फरवरी 2000 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ, लेकिन उनकी तबला की धुन आज भी जीवित है।


उस्ताद जाकिर हुसैन ने अपने पिता से मिले ज्ञान के बल पर कम उम्र में ही तबला वादन में प्रसिद्धि हासिल की। उन्हें 1988 में सबसे कम उम्र में पद्मश्री, 2002 में पद्म भूषण और 2023 में भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण मिला।


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