इरफान खान: संघर्ष से सफलता तक की अद्भुत यात्रा
इरफान खान का अद्वितीय सफर
नई दिल्ली, 6 जनवरी। सिनेमा की दुनिया में कई कलाकार आते हैं, जिनमें से कुछ अपनी प्रतिभा और सरलता से दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बना लेते हैं। छोटे शहरों से निकलकर बड़े पर्दे पर अपनी पहचान बनाना आसान नहीं होता, लेकिन कुछ लोग कठिनाइयों को चुनौती देकर अपनी जगह बनाते हैं। उनकी अदाकारी में एक सहजता होती है, जो दर्शकों को उनकी जीवन यात्रा का हिस्सा बना देती है।
दिवंगत अभिनेता इरफान खान का नाम ऐसे ही कलाकारों में शामिल है। 7 जनवरी 1967 को राजस्थान के जयपुर में एक मुस्लिम पठान परिवार में जन्मे इरफान का करियर आसान नहीं रहा। उनके परिवार का कोई क्रिएटिव बैकग्राउंड नहीं था, इसलिए अभिनय का सपना देखना उनके लिए एक बड़ा जोखिम था। इरफान ने खुद कहा था, “मैंने कुछ फिल्में देखीं और एक्टर बनने का सपना देख लिया। ये मेरे जीवन का सबसे बड़ा रिस्क था।”
इरफान के शुरुआती दिन काफी कठिन थे। जब उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) में दाखिला लिया, उसी समय उनके पिता का निधन हो गया। घर से पैसे मिलना बंद हो गया, लेकिन इरफान ने हार नहीं मानी और एनएसडी से मिलने वाली फेलोशिप के जरिए अपना कोर्स पूरा किया। एक्टिंग से पहले उन्हें मुंबई में इलेक्ट्रिशियन का काम करना पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने राजेश खन्ना के घर एसी ठीक करने का काम किया। जब उन्होंने पहली बार राजेश खन्ना को देखा, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
इरफान ने अपने करियर की शुरुआत छोटे पर्दे से की। 1985 में दूरदर्शन के धारावाहिक 'श्रीकांत' ने उन्हें पहला बड़ा अनुभव दिया। इसके अलावा उन्होंने 'भारत एक खोज', 'चाणक्य', 'चंद्रकांता', 'सारा जहां हमारा', 'बनेगी अपनी बात' और संजय खान के धारावाहिक 'जय हनुमान' में भी काम किया। 'जय हनुमान' में उन्होंने महर्षि वाल्मीकि की भूमिका निभाई, जिसमें उनके डाकू वाले हिस्से को भी दिखाया गया था। हालांकि, इस भूमिका को लेकर पंजाब के वाल्मीकि समाज ने विरोध भी किया था।
इस दौरान मीरा नायर ने उन्हें फिल्म 'सलाम बॉम्बे' में कैमियो रोल दिया, लेकिन उनका सीन कट गया। मीरा नायर ने वादा किया कि किसी दूसरी फिल्म में उन्हें लीड रोल मिलेगा, और यह वादा उन्होंने 2006 में 'द नेमसेक' में पूरा किया। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान उन्हें अमेरिका में छह महीने बिताने के लिए केवल 10 लाख रुपए मिले थे। उस समय तक उनके संघर्ष खत्म नहीं हुए थे, लेकिन उनके आत्मविश्वास ने उन्हें कभी हारने नहीं दिया।
इरफान खान ने अपने करियर में कई बेहतरीन और यादगार फिल्मों में काम किया। 'द लंच बॉक्स', 'करीब करीब सिंगल', 'पीकू', 'मदारी', 'कारवां', 'ब्लैकमेल', 'अंग्रेजी मीडियम' जैसी फिल्मों में उनके किरदारों ने दर्शकों को हंसाया, रुलाया और सोचने पर मजबूर किया। उनके अभिनय की सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने हर किरदार को बेहद असली और संवेदनशील तरीके से निभाया। उनकी आंखों में भाव था, उनकी आवाज में ताकत थी और उनकी चुप्पी में भी कहानी समाई रहती थी।
इरफान न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। 29 अप्रैल 2020 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
.png)