हरिहरन: संगीत की दुनिया में इंसानी एहसास की अहमियत पर जोर देने वाले दिग्गज गायक
हरिहरन का संगीत सफर
मुंबई, 2 अप्रैल। वर्तमान में म्यूजिक इंडस्ट्री में तेजी से बदलाव आ रहा है, जहां तकनीक का प्रभाव हर गाने में स्पष्ट है। लेकिन कुछ कलाकार, जैसे कि प्रसिद्ध गायक हरिहरन, आज भी असली और भावनात्मक संगीत की बात करते हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा कि मशीनों द्वारा संशोधित गाने उन्हें कृत्रिम लगते हैं।
हरिहरन का जन्म 3 अप्रैल 1955 को मुंबई में एक तमिल परिवार में हुआ। उनके माता-पिता शास्त्रीय संगीत से जुड़े थे, जिससे घर में हमेशा संगीत का माहौल बना रहता था। इसी कारण, हरिहरन ने बचपन से ही संगीत की शिक्षा लेना शुरू किया। कहा जाता है कि वह कई घंटे रियाज करते थे, जिससे उनकी आवाज में गहराई और मिठास आई।
हरिहरन ने अपनी शिक्षा मुंबई के स्कूलों और कॉलेजों में प्राप्त की, लेकिन उनका ध्यान हमेशा संगीत पर रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत कॉन्सर्ट और टीवी से की, जिसमें उन्हें प्रारंभिक दिनों में काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा। 1977 में, उन्होंने 'ऑल इंडिया सुर सिंगार कॉम्पिटिशन' जीती, जिससे उन्हें पहचान मिली।
इसके बाद, प्रसिद्ध संगीतकार जयदेव ने उन्हें फिल्म 'गमन' में गाने का अवसर दिया। उनका पहला गाना 'अजीब सानेहा मुझ पर गुजर गया, यारों' तुरंत हिट हो गया, जिसने उन्हें नई पहचान दिलाई और अवॉर्ड्स के लिए नॉमिनेशन भी मिला।
हरिहरन के करियर में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने ए.आर. रहमान के साथ काम करना शुरू किया। फिल्म 'रोजा' का गाना 'रोजा जानेमन' आज भी लोगों की जुबान पर है। इसके बाद उन्होंने 'तू ही रे', 'बाहों के दरमियां', 'झोंका हवा का' जैसे कई हिट गाने दिए। उनकी आवाज ने हर गाने में एक विशेषता जोड़ दी।
हरिहरन ने गजल के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाई है। उनकी गजलों में गहराई और सुकून होता है, जो सीधे दिल को छू जाता है। उन्होंने कई हिट गजल एल्बम्स दिए हैं, जिन्हें लोग आज भी पसंद करते हैं।
एक साक्षात्कार में, हरिहरन ने म्यूजिक इंडस्ट्री में बढ़ती तकनीक पर अपनी राय व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आजकल गानों को मशीनों से इतना सुधार दिया जाता है कि उनमें इंसानी एहसास कम हो जाता है। असली गायक वही होता है, जो अपनी आवाज से भावनाएं व्यक्त कर सके।
हरिहरन ने अपने लंबे करियर में कई भाषाओं में हजारों गाने गाए हैं, जैसे हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़ और अन्य। यही कारण है कि वे पूरे देश में लोकप्रिय हैं। उनकी मेहनत और योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया है, और वे दो बार नेशनल अवॉर्ड भी जीत चुके हैं।
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