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विशाल भारद्वाज ने 'मकबूल' के लिए 30 लाख की फीस छोड़ी, जानें क्यों?

विशाल भारद्वाज, हिंदी सिनेमा के एक प्रमुख फिल्मकार, ने अपनी फिल्म 'मकबूल' के लिए 30 लाख रुपए की फीस छोड़ने का साहसिक निर्णय लिया। इस लेख में हम उनके जीवन, करियर की शुरुआत, और इस महत्वपूर्ण फिल्म के निर्माण के पीछे की कहानी का पता लगाएंगे। जानें कैसे उन्होंने अपने संघर्षों को पार किया और भारतीय सिनेमा में अपनी पहचान बनाई।
 

विशाल भारद्वाज का फिल्मी सफर


मुंबई, 3 अगस्त। विशाल भारद्वाज हिंदी सिनेमा के उन विशिष्ट निर्देशकों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी अनूठी सोच और फिल्मों के माध्यम से पहचान बनाई है। उन्होंने संगीतकार, लेखक, निर्देशक, निर्माता और गायक के रूप में कार्य किया है। उनके करियर में कई उतार-चढ़ाव आए, जिसमें आर्थिक कठिनाइयों का सामना भी शामिल है। एक समय ऐसा आया जब उन्होंने अपनी प्रसिद्ध फिल्म 'मकबूल' को पूरा करने के लिए 30 लाख रुपए की फीस छोड़ने का निर्णय लिया। यह निर्णय उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।


विशाल का जन्म 4 अगस्त 1965 को उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के चांदपुर में हुआ। उनका बचपन नजीबाबाद और मेरठ में बीता। उनके पिता, राम भारद्वाज, गन्ना निरीक्षक थे और हिंदी फिल्मों के लिए गीत और कविताएं लिखते थे। घर में संगीत का माहौल होने के कारण, विशाल का झुकाव संगीत की ओर बढ़ा। हालांकि, उनका पहला सपना क्रिकेट था, और वह उत्तर प्रदेश की अंडर-19 टीम के लिए खेल चुके थे। लेकिन एक गंभीर चोट ने उनके क्रिकेट करियर को समाप्त कर दिया।


17 साल की उम्र में, विशाल ने अपना पहला गीत लिखा, जिसे उनके पिता ने संगीतकार उषा खन्ना को सुनाया। यह गीत फिल्म 'यार कसम' में शामिल हुआ। इसके बाद, उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से पढ़ाई की, जहां उनकी मुलाकात रेखा भारद्वाज से हुई, जो बाद में उनकी पत्नी बनीं। पढ़ाई के बाद, उन्होंने 1995 में फिल्म 'अभय' से संगीतकार के रूप में करियर की शुरुआत की। 'माचिस' के संगीत ने उन्हें फिल्मफेयर का आर.डी. बर्मन पुरस्कार दिलाया।


संगीत में सफलता के बाद, उन्होंने 2002 में बच्चों की फिल्म 'मकड़ी' से निर्देशन की शुरुआत की। 2003 में आई 'मकबूल' ने उन्हें एक नई पहचान दी। यह फिल्म शेक्सपियर के नाटक 'मैकबेथ' पर आधारित थी। इस फिल्म के लिए बजट सीमित था, और कई कलाकार इसमें काम करने से हिचकिचा रहे थे।


विशाल ने एक इंटरव्यू में बताया कि 'मकबूल' की शूटिंग भोपाल की एक हवेली में करना उनके लिए आवश्यक था, लेकिन बजट की कमी के कारण उन्हें अपनी 30 लाख रुपए की फीस छोड़ने का सुझाव दिया गया। उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी पूरी फीस छोड़ दी। उन्होंने कहा कि आज तक उन्हें 'मकबूल' से कोई आर्थिक लाभ नहीं हुआ, लेकिन इस फिल्म ने उन्हें जो सम्मान और पहचान दी, वह किसी भी धन से अधिक महत्वपूर्ण थी।


'मकबूल' की सफलता के बाद, विशाल ने कई सफल फिल्में बनाई, जैसे 'ओमकारा' और 'हैदर', जो देश और विदेश में सराही गईं। इसके अलावा, 'कमीने', '7 खून माफ', 'मटरू की बिजली का मंडोला', 'रंगून', 'खुफिया' और 'चार्ली चोपड़ा एंड द मिस्ट्री ऑफ सोलांग वैली' जैसी फिल्मों में भी उनकी अनूठी सोच दिखाई दी।


विशाल ने निर्देशन के साथ-साथ संगीत और गायन में भी काम किया है। उनकी जोड़ी गीतकार गुलजार के साथ सबसे सफल मानी जाती है। उन्होंने कई बार कहा है कि संगीत उनका पहला प्यार है।


विशाल भारद्वाज को अब तक नौ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुके हैं, साथ ही फिल्मफेयर पुरस्कार और कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान भी। उनकी फिल्मों को कान्स और टोरंटो जैसे बड़े फिल्म समारोहों में प्रदर्शित किया गया है।


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