विधु विनोद चोपड़ा: संघर्ष से सफलता तक का सफर
विधु विनोद चोपड़ा का फिल्मी सफर
मुंबई, 4 सितंबर। विधु विनोद चोपड़ा को हिंदी सिनेमा के उन निर्देशकों में माना जाता है, जिन्होंने ऐसी कहानियों को पर्दे पर जीवंत किया है, जिनका प्रभाव लंबे समय तक दर्शकों पर बना रहा। उनकी प्रमुख फिल्मों में 'परिंदा', '1942: ए लव स्टोरी', 'मिशन कश्मीर', 'मुन्नाभाई एमबीबीएस', '3 इडियट्स' और '12वीं फेल' शामिल हैं। हालांकि, इस सफलता तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था। फिल्म निर्माण का सपना देखने पर उन्हें अपने पिता की नाराजगी का सामना करना पड़ा। यहां तक कि जब उनकी फिल्म ऑस्कर के लिए नामांकित हुई, तब भी उनके पिता ने पहले यही पूछा कि इससे उन्हें कितने पैसे मिलेंगे।
विधु विनोद चोपड़ा का जन्म 5 सितंबर 1952 को श्रीनगर में हुआ। उनका बचपन कश्मीर में बीता और उन्होंने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एफटीआईआई) से निर्देशन की पढ़ाई की। यहीं पर उनके भीतर सिनेमा के प्रति जुनून और गहरा हुआ। फिल्म निर्माण का निर्णय परिवार के लिए आसान नहीं था, क्योंकि उनके पिता चाहते थे कि वह एक सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ें।
एक इंटरव्यू में चोपड़ा ने अपने शुरुआती दिनों का एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया, 'जब मैंने अपने पिता को बताया कि मैं फिल्में बनाना चाहता हूं, तो उन्होंने मुझे थप्पड़ मारा और कहा कि तुम भूखे मरोगे। मुंबई में कैसे रहोगे? उनके पास मुझे फिल्म स्कूल भेजने के लिए पैसे नहीं थे। मैंने भारत सरकार की नेशनल स्कॉलरशिप के लिए कड़ी मेहनत की और कश्मीर यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स ऑनर्स में टॉप किया। इस स्कॉलरशिप की मदद से मैंने पुणे के फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया। इस दौरान मैंने एक शॉर्ट फिल्म 'मर्डर एट मंकी हिल' बनाई, जिसे नेशनल अवॉर्ड मिला।'
इसके बाद, उन्होंने 'एन एनकाउंटर विद फेसेस' नामक एक डॉक्यूमेंट्री बनाई, जो भारत के गरीब बच्चों की जिंदगी पर आधारित थी और 1979 में इसे ऑस्कर के लिए नामांकित किया गया। यह उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। जब उन्होंने अपने पिता को ऑस्कर नामांकन की खबर दी, तो वह बेहद खुश हुए और उन्हें गले लगाया, लेकिन फिर पूछा कि इससे पैसे कितने मिलेंगे। चोपड़ा ने बताया कि ऑस्कर नामांकन के लिए कोई पैसा नहीं मिलता। यह किस्सा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि उनके पिता की चिंता वास्तव में उनके भविष्य और कमाई को लेकर थी।
इसके बाद चोपड़ा ने फिल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाने के लिए लगातार मेहनत की। 1976 में 'मर्डर एट मंकी हिल' के बाद उन्होंने 'सजाए मौत' बनाई, जो उनकी शुरुआती फीचर फिल्मों में से एक थी। 1980 के दशक में उन्होंने 'खामोश' जैसी फिल्म बनाई। 1989 में आई 'परिंदा' ने उनके निर्देशन को एक नई पहचान दी। इस फिल्म में अनिल कपूर, जैकी श्रॉफ, माधुरी दीक्षित और नाना पाटेकर जैसे कलाकार शामिल थे। फिल्म को कहानी और निर्देशन के लिए काफी सराहा गया।
1994 में '1942: ए लव स्टोरी' आई, जो आज भी हिंदी सिनेमा की यादगार फिल्मों में से एक मानी जाती है। इसके बाद चोपड़ा ने 'करीब', 'मिशन कश्मीर' और कई अन्य फिल्मों के जरिए अपनी पहचान को मजबूत किया। उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने राजकुमार हिरानी के साथ 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' बनाई। इसके बाद 'लगे रहो मुन्नाभाई' और '3 इडियट्स' जैसी फिल्मों ने उनकी प्रोडक्शन कंपनी को और मजबूती दी।
चोपड़ा ने निर्माता के रूप में 'पीके' और 'संजू' जैसी फिल्मों से भी बड़ी सफलता हासिल की। वह केवल निर्माता नहीं, बल्कि अपनी फिल्मों की कहानी, संपादन और अन्य रचनात्मक कार्यों में भी गहराई से जुड़े रहे।
उनके करियर में कश्मीर हमेशा एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। 2020 में उन्होंने 'शिकारा' बनाई, जिसमें कश्मीरी पंडितों के विस्थापन की कहानी दिखाई गई। इसके बाद 2023 में आई '12वीं फेल' को दर्शकों और आलोचकों से भरपूर प्यार मिला।
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