रानी मुखर्जी ने हिंदी सिनेमा में 30 साल पूरे किए: जानिए उनके करियर की अनकही बातें
रानी मुखर्जी का करियर: 30 साल का सफर
मुंबई, 12 जनवरी। बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने आज हिंदी सिनेमा में अपने तीन दशकों का सफर पूरा कर लिया है। इस खास मौके पर उन्होंने अपने अनुभवों और भावनाओं को साझा किया। रानी ने यश राज फिल्म्स के इंस्टाग्राम पर एक नोट पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी भी फिल्मों में कोई मास्टर प्लान नहीं बनाया।
उन्होंने कहा कि उन्हें यह रास्ता खुद-ब-खुद मिला और वह हमेशा उस नई लड़की की तरह महसूस करती थीं, जो पहली बार कैमरे के सामने खड़ी होती है।
रानी ने बताया, ''जब मैंने 1997 में 'राजा की आएगी बारात' से अपने करियर की शुरुआत की, तब मुझे नहीं पता था कि अभिनय में क्या संभावनाएं हो सकती हैं। उस समय, एक्टिंग ने मुझे जीवन में जीवंतता दी। इस फिल्म ने मुझे यह सिखाया कि सिनेमा केवल ग्लैमर के लिए नहीं है, बल्कि जिम्मेदारी का भी है। मैंने उस किरदार के माध्यम से समझा कि महिलाओं के लिए गरिमा की लड़ाई कितनी महत्वपूर्ण है, और यह अनुभव मेरे भविष्य के अभिनय को आकार देने वाला साबित हुआ।''
उन्होंने 1990 के दशक के अंत को अपने लिए 'जादुई' बताया। रानी ने कहा, ''उस समय दर्शकों ने मेरे करियर की दिशा तय की। उन फिल्मों ने मुझे अवसर दिए, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण यह था कि मैंने उस वक्त यह समझा कि हिंदी सिनेमा लोगों के दिलों में कितना गहराई से बसा हुआ है। उस दौर के सेट पर मेरा समय सीखने और आनंद से भरा रहा। मैंने कई मेंटर्स और सहयोगियों से मार्गदर्शन और प्रेरणा प्राप्त की।''
2000 के दशक के शुरुआती वर्षों में, रानी ने अपने अभिनय की पहचान और आवाज ढूंढी। उन्होंने कहा, '''साथिया' मेरे करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जिसमें मैंने एक दोषपूर्ण, भावुक और सहज महिला का किरदार निभाया। मुझे पर्दे पर परफेक्ट बनने की इच्छा नहीं थी, बल्कि ईमानदार और वास्तविक अभिनय करने की चाह थी। इसी सोच ने 'हम तुम' जैसी फिल्मों की ओर अग्रसर किया, और यह दिखाया कि महिलाएं स्क्रीन पर हास्यपूर्ण और संवेदनशील सभी भावों को साथ लेकर चल सकती हैं।''
फिर आई 'ब्लैक', जिसने उनके अभिनय के बारे में उनके विश्वास को पूरी तरह बदल दिया। रानी ने कहा, ''संजय लीला भंसाली और अमिताभ बच्चन के साथ काम करना मुझे अपनी छिपी हुई संभावनाओं तक ले गया। यह अनुभव अनुशासन, समर्पण और साहस मांगता था। 'ब्लैक' मेरे जीवन का एक अत्यधिक भावनात्मक अनुभव बना और इसने मुझे सिखाया कि कभी-कभी मौन भाव भी शब्दों से भी अधिक बोल सकता है।''
रानी ने कहा कि उन्हें हमेशा ऐसी महिलाओं के किरदारों ने आकर्षित किया जो समाज को चुनौती देती हैं। इसमें 'बंटी और बबली', 'नो वन किल्ड जेसिका', और 'मर्दानी' जैसी फिल्में शामिल हैं। खास तौर पर 'मर्दानी' मेरे दिल के बहुत करीब है, क्योंकि शिवानी शिवाजी रॉय का किरदार शांति से शक्ति दिखाता है और यह दिखाता है कि कठिन लेकिन आशावादी कहानियां कितनी प्रभावशाली हो सकती हैं।''
रानी ने कहा, ''शादी और बेटी अदीरा ने मुझे धीमा होने नहीं दिया, बल्कि मेरे फोकस को तेज किया। मैंने ज्यादा समझदारी से फिल्मों का चयन करना शुरू किया और अपनी ऊर्जा को बचाए रखा। इसके बाद 'हिचकी' और 'मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे' जैसी फिल्मों ने संवेदनशीलता और भावनात्मक सच्चाई की गहराई समझाई। 'मिसेज चटर्जी वर्सेस नॉर्वे' ने मुझे पहला नेशनल अवॉर्ड दिलाया।''
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