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मनोज कुमार: कैसे बने 'भारत कुमार' और देशभक्ति के प्रतीक?

मनोज कुमार, जिन्हें 'भारत कुमार' के नाम से जाना जाता है, ने भारतीय सिनेमा में देशभक्ति की एक नई परिभाषा दी। उनका जीवन संघर्ष और प्रेरणा से भरा था। विभाजन के दर्द से लेकर फिल्म उद्योग में उनके सफर तक, जानें कैसे उन्होंने अपने अभिनय से लोगों के दिलों में जगह बनाई। उनके जीवन की कहानी न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि यह हमें यह भी बताती है कि कैसे एक व्यक्ति अपने अनुभवों से एक आइकॉन बन सकता है।
 

मनोज कुमार का अद्वितीय सफर


सिनेमा की दुनिया में कई सितारे आए, लेकिन एक अभिनेता ऐसा था जिसने *उपकार*, *पूरब और पश्चिम* और *रोटी कपड़ा और मकान* जैसी फिल्मों के माध्यम से देशभक्ति की एक नई परिभाषा दी। उनका नाम मनोज कुमार था। उनके देश के प्रति प्रेम ने उन्हें 'भारत कुमार' के नाम से मशहूर कर दिया।


उनकी फिल्मों में जो उत्साह और गहराई थी, वह केवल अभिनय का परिणाम नहीं था। जब वे केवल दस साल के थे, तब उन्होंने भारत-पाकिस्तान के विभाजन के दौरान भयानक दृश्य देखे थे। उन्होंने अपनी बीमार माँ की कराह और छोटे भाई की अंतिम सांसें सुनी थीं। उस समय, कोई नहीं जानता था कि वह बच्चा एक दिन देशभक्ति का प्रतीक बनेगा। आज मनोज कुमार का जन्मदिन है। उनका निधन अप्रैल 2025 में हुआ था; यदि वे आज जीवित होते, तो उनकी उम्र 88 वर्ष होती। आइए, उनके जीवन के इस महत्वपूर्ण अवसर पर उनके सफर पर नजर डालते हैं।


दुखद बचपन की कहानी

किस्सा 1


मनोज कुमार, जिनका असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था, का जन्म 24 जुलाई, 1937 को ब्रिटिश भारत के एबटाबाद में हुआ। विभाजन के बाद, उनका जन्मस्थान पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में चला गया।


जब मनोज कुमार केवल दस साल के थे, तब विभाजन के कारण उनके परिवार को दिल्ली के हडसन लाइन्स रिफ्यूजी कैंप में शरण लेनी पड़ी। उनके छोटे भाई कुक्कू की केवल दो महीने की उम्र में मृत्यु हो गई। मनोज ने अपने भाई की मौत के बाद डॉक्टरों पर गुस्सा किया और उन्हें पीटा। उन्होंने कहा, "अगर किसी इंसान का बचपन मर जाता है, तो ऐसा लगता है जैसे वह इंसान खुद ही मर गया हो।"


मनोज कुमार ने अपने भाई की मौत के बाद भी रिफ्यूजी कैंप में दो महीने बिताए। बाद में उनका परिवार दिल्ली में बस गया। उनके पिता एक स्टील फैक्ट्री में काम करते थे और कवि भी थे।


फिल्मों की दुनिया में कदम

किस्सा 3


अपने कज़िन के पत्र के बाद, मनोज कुमार बॉम्बे चले गए। वहां उन्हें फिल्म सेट पर सामान ढोने का काम मिला। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से अपनी पढ़ाई पूरी की।


मनोज कुमार ने अपने कज़िन से कहा, "तो मुझे हीरो बना दीजिए।" जब उनके कज़िन ने उन्हें फिल्म में काम करने का मौका दिया, तो मनोज ने 19 साल की उम्र में अपनी पहली फिल्म में 90 साल के भिखारी का किरदार निभाया।


दिलीप कुमार से प्रेरणा

किस्सा 5


मनोज कुमार का असली नाम हरिकृष्ण गिरि गोस्वामी था, लेकिन उन्होंने दिलीप कुमार की फिल्म *शबनम* से प्रेरित होकर अपना नाम बदलकर मनोज कुमार रखा।


उन्होंने कई छोटी भूमिकाएं निभाईं, लेकिन 1960 की फिल्म *कांच की गुड़िया* में लीड रोल मिलने के बाद उनकी पहचान बनी। 1962 की फिल्म *हरियाली और रास्ता* ने उन्हें असली स्टार बना दिया।


देशभक्ति की फिल्मों का निर्माण

किस्सा 6


1965 में, मनोज कुमार ने भगत सिंह पर आधारित फिल्म *शहीद* में काम किया। यह फिल्म बहुत सफल रही और इसके गाने आज भी लोकप्रिय हैं।


प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने उन्हें 'जय जवान, जय किसान' पर आधारित फिल्म बनाने का सुझाव दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने *उपकार* बनाई।


इमरजेंसी का विरोध

किस्सा 7


मनोज कुमार ने इमरजेंसी की घोषणा का विरोध किया, जिसके कारण उनकी कई फिल्मों पर बैन लगा।


उन्होंने इमरजेंसी पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाने से इनकार कर दिया, जिससे उनकी सच्चाई का पता चलता है।


दिलीप कुमार के साथ काम

किस्सा 9


मनोज कुमार ने दिलीप कुमार को अपनी फिल्म *क्रांति* में कास्ट किया। दिलीप कुमार ने इस फिल्म के लिए चार साल बाद वापसी की।


फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर शानदार सफलता हासिल की और यह उस साल की सबसे बड़ी हिट बनी।


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