मजरूह सुल्तानपुरी: एक गीतकार की अनकही कहानी और उनके अमर गीत
मजरूह सुल्तानपुरी का जीवन और करियर
मुंबई, 30 सितंबर। प्रसिद्ध गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे हुए गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उन्होंने प्यार, दर्द, दोस्ती और जीवन के विभिन्न पहलुओं को सरल शब्दों में व्यक्त किया, जिससे उनके गीत आम जनता से जुड़ गए। हालांकि, बहुत से लोग नहीं जानते कि मजरूह ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने के लिए शुरुआत में अनिच्छा दिखाई थी। उन्हें फिल्मों के लिए गीत लिखने में कोई खास रुचि नहीं थी, जिसके लिए एक प्रसिद्ध शायर को उन्हें मनाने में काफी मेहनत करनी पड़ी।
मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ। उनका असली नाम असरार हसन खान था। उनके पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और उन्होंने मजरूह की प्रारंभिक शिक्षा मदरसे में कराई। बाद में, मजरूह ने यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और कुछ समय तक हकीम के रूप में काम किया, लेकिन उनका असली जुनून शायरी था। मुशायरों में उनकी शायरी को लोगों ने सराहा और धीरे-धीरे उन्होंने शायरी को अपने करियर का रास्ता बना लिया।
मजरूह की शायरी को दिशा देने में मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी का योगदान महत्वपूर्ण रहा। 1945 में, मजरूह ने मुंबई के एक मुशायरे में अपनी शायरी प्रस्तुत की, जहां फिल्म निर्माता एआर कारदार ने उन्हें सुना और अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, मजरूह ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, क्योंकि उनका मानना था कि फिल्मी गीत लिखना उनकी शायरी के मुकाबले कमतर है। जिगर मुरादाबादी ने उन्हें समझाया कि फिल्मों के लिए लिखने से अच्छी कमाई होगी और इससे वह अपने परिवार की मदद कर सकेंगे। अंततः मजरूह ने इस पेशकश को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद, कारदार उन्हें संगीतकार नौशाद के पास ले गए। नौशाद ने मजरूह को एक धुन और उसका मीटर दिया और उस पर कुछ लिखने के लिए कहा। मजरूह ने उसी आधार पर 'जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के' लिखा। नौशाद को उनका लिखा पसंद आया और इस तरह 1946 में आई फिल्म 'शाहजहां' से मजरूह के फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ। इसी फिल्म में उनका लिखा 'जब दिल ही टूट गया' भी था, जिसे के. एल. सहगल ने गाया।
'शाहजहां' के बाद मजरूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 'अंदाज', 'आर पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'सीआईडी', 'नौ दो ग्यारह', 'काला पानी', 'सुजाता', 'गाइड' और 'ज्वेल थीफ' जैसी फिल्मों के लिए कई यादगार गीत लिखे। एसडी बर्मन, ओपी नैयर, आरडी बर्मन, नौशाद और अन्य संगीतकारों के साथ उनकी जोड़ी शानदार रही। उनके गीत समय के साथ बदलते रहे।
मजरूह ने नई पीढ़ी के लिए भी कई गीत लिखे, जैसे 'कयामत से कयामत तक' का 'पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा', 'जो जीता वही सिकंदर' का 'पहला नशा' और 'हम किसी से कम नहीं' जैसे गाने लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुए। उन्होंने अपने पांच दशक से अधिक के करियर में लगभग 350 फिल्मों के लिए हजारों गीत लिखे।
उनके काम को कई पुरस्कार मिले। 'दोस्ती' के गीत 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे' के लिए उन्हें 1965 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला। 1993 में, वह दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बने। साहित्य के क्षेत्र में भी उन्हें गालिब पुरस्कार और इकबाल सम्मान जैसे पुरस्कार मिले। मजरूह सुल्तानपुरी का निधन 80 वर्ष की आयु में 24 मई 2000 को मुंबई में हुआ।
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