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भूपिंदर सिंह: भारतीय संगीत के अनमोल रत्न की याद में एक श्रद्धांजलि

भूपिंदर सिंह, एक अद्वितीय पार्श्वगायक और गज़ल गायक, की पुण्यतिथि पर उनकी संगीत यात्रा को याद किया जा रहा है। 6 फरवरी 1940 को जन्मे भूपिंदर ने अपने करियर में कई दिग्गजों के साथ काम किया और अपनी आवाज से संगीत प्रेमियों का दिल जीता। उनकी गज़लें और गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। जानें उनके जीवन, करियर और संगीत जगत में उनके योगदान के बारे में।
 

संगीत की दुनिया में अमिट छाप छोड़ने वाले भूपिंदर सिंह


नई दिल्ली, 17 जुलाई। हर साल कुछ आवाजें और भी गहराई से सुनाई देती हैं। भूपिंदर सिंह, जो एक अद्वितीय पार्श्वगायक और गज़ल गायक थे, की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना उस समय को पुनः जीने जैसा है, जिसने हमें सुर, शब्द और भावनाओं का अनुभव कराया। उनकी आवाज ने फिल्म संगीत और गज़लों में एक ऐसी छाप छोड़ी है, जो आज भी श्रोताओं के दिलों में ताजगी के साथ जीवित है।


भूपिंदर सिंह का जन्म 6 फरवरी, 1940 को पंजाब के अमृतसर में हुआ। उनके पिता, प्रोफेसर नत्था सिंह, एक प्रतिभाशाली संगीतकार थे, जिन्होंने उन्हें संगीत की शिक्षा दी। हालांकि, पिता की सख्ती के कारण भूपिंदर का संगीत में मन उचट गया था, लेकिन उनकी प्रतिभा ने उन्हें जल्द ही इस क्षेत्र का चमकता सितारा बना दिया। उनका संगीत सफर दिल्ली के ऑल इंडिया रेडियो से शुरू हुआ, जहाँ उन्होंने गायक और संगीतकार के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनकी गज़लें पहले आकाशवाणी पर प्रसारित हुईं और फिर दिल्ली दूरदर्शन तक पहुंचीं। इसी दौरान, संगीतकार मदन मोहन की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने भूपिंदर को मुंबई बुलाया, जहाँ से उनके हिंदी फिल्म संगीत में करियर की शुरुआत हुई।


भूपिंदर सिंह ने 1964 में चेतन आनंद की फिल्म 'हकीकत' से बॉलीवुड में पार्श्वगायन की शुरुआत की। इस फिल्म में उन्होंने मोहम्मद रफी, तलत महमूद और मन्ना डे के साथ मिलकर मदन मोहन द्वारा रचित अमर गीत 'होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा' गाया। इसके बाद, उन्हें फिल्म 'आखिरी खत' में खय्याम के संगीत निर्देशन में अपना पहला एकल गीत 'रुत जवान जवान रात मेहरबान' गाने का मौका मिला। अपने लगभग पांच दशकों के करियर में, भूपिंदर ने संगीत जगत के कई दिग्गजों के साथ काम किया, जिनमें मोहम्मद रफी, आरडी बर्मन, लता मंगेशकर, और आशा भोसले शामिल हैं।


भूपिंदर सिंह केवल एक पार्श्वगायक नहीं थे, बल्कि एक कुशल गिटारवादक भी थे। उन्होंने 'दम मारो दम', 'चुरा लिया है', और 'महबूबा ओ महबूबा' जैसे लोकप्रिय गीतों में गिटार बजाकर अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी गायकी का दायरा बहुत व्यापक था, और उनके गाए कई गीत आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसे हुए हैं।


गुलजार, जो एक प्रसिद्ध लेखक और फिल्मकार हैं, ने भूपिंदर की आवाज की तारीफ करते हुए कहा था कि 'भूपिंदर की आवाज किसी पहाड़ी से टकराने वाली बारिश की बूंदों की तरह है। उनकी मखमली आवाज आत्मा तक सीधे पहुंचती है।' यह टिप्पणी उनकी गायकी की गहराई और संवेदनशीलता को बखूबी दर्शाती है।


भूपिंदर सिंह ने 1980 के दशक में गायिका मिताली मुखर्जी से विवाह किया। उनकी मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई थी, जो बाद में प्रेम और विवाह में बदल गई। शादी के बाद, उन्होंने सक्रिय पार्श्वगायन से कुछ दूरी बना ली, लेकिन दोनों ने मिलकर कई लाइव शो किए और निजी एल्बम बनाए। उनके परिवार में उनकी पत्नी और एक बेटा निहाल शामिल हैं, जो खुद एक संगीतकार हैं।


भूपिंदर सिंह ने गज़लों की दुनिया में भी अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनकी आवाज की गहराई और शब्दों की संवेदनशील प्रस्तुति ने उन्हें भारतीय संगीत जगत के सबसे सम्मानित कलाकारों में शामिल किया।


साल 2022 में, 18 जुलाई को, उनका निधन 82 वर्ष की आयु में हुआ। वह लंबे समय से बीमार थे और उनकी पत्नी के अनुसार, निधन से पहले वे नौ दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहे। दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ, जिससे भारतीय संगीत जगत ने एक अनमोल आवाज खो दी।


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