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भगवान दादा: भारतीय सिनेमा के अनोखे सितारे की कहानी

भगवान आबाजी पालव, जिन्हें भगवान दादा के नाम से जाना जाता है, का जन्म 1 अगस्त 1913 को हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक जूनियर आर्टिस्ट के रूप में की और बाद में भारतीय सिनेमा में कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उनकी फिल्म 'अलबेला' ने उन्हें रातों-रात प्रसिद्धि दिलाई। इस लेख में जानें उनके संघर्ष, सफलता और सिनेमा में उनके योगदान के बारे में।
 

भगवान दादा का संघर्ष और सफलता


नई दिल्ली, 31 जुलाई। भगवान आबाजी पालव का जन्म 1 अगस्त 1913 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ। उनका बचपन कठिनाइयों से भरा था, क्योंकि उनके पिता मुंबई में एक कपड़ा मिल में काम करते थे। भगवान दादा ने भी अपने करियर की शुरुआत एक मिल मजदूर के रूप में की। मूक फिल्मों के युग में, उन्होंने सिनेमा में अपने पहले कदम एक जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर रखा।


भगवान दादा को कुश्ती का बहुत शौक था, और उनकी मजबूत कद-काठी ने उन्हें स्टंट फिल्मों में काम करने के लिए प्रेरित किया। शुरुआती दिनों में, उन्होंने 65,000 रुपए के सीमित बजट में फिल्में बनाई, जिसमें कलाकारों के लिए भोजन और वेशभूषा की व्यवस्था भी खुद की। उनके काम के प्रति समर्पण इतना था कि वे कई घंटों तक कड़क रोशनी में शूटिंग करते हुए सेट पर सोने की कला सीख गए।


भारतीय सिनेमा में भगवान दादा का योगदान उनकी प्रमुख फिल्मों के माध्यम से स्पष्ट होता है। 1938 में 'बहादुर किसान' से सह निर्देशक के रूप में उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की। 1941 की तमिल फिल्म 'वन मोहिनी' ने उन्हें पहचान दिलाई। 1949 की 'भेदी बंगला' ने सस्पेंस-हॉरर का नया प्रयोग किया। 1951 में आई 'अलबेला' ने उन्हें ब्लॉकबस्टर बना दिया। 1953 में 'झमेला' और 1958 में 'भला आदमी' से उन्होंने कई नए कलाकारों को अवसर दिया।


1951 में राज कपूर की सलाह पर उन्होंने सामाजिक फिल्म 'अलबेला' बनाई, जिसमें सी. रामचंद्र का संगीत और भगवान दादा का डांसिंग स्टाइल पूरे देश में प्रसिद्ध हो गया। उनके इस अनोखे डांसिंग स्टाइल ने बाद में अमिताभ बच्चन, गोविंदा और ऋषि कपूर जैसे सितारों को भी प्रेरित किया। 'अलबेला' की सफलता ने उन्हें रातों-रात प्रसिद्धि दिलाई।


'अलबेला' के बाद उनकी फिल्म 'झमेला' (1953) बॉक्स ऑफिस पर असफल रही। जीवन के अंतिम वर्षों में, उन्होंने छोटे-मोटे रोल भी किए। दिलीप कुमार, सी. रामचंद्र और ओम प्रकाश अक्सर उनसे मिलने चॉल में जाते थे। कहा जाता है कि एक बार अमिताभ बच्चन ने उनके कहने पर बिना किसी शिकायत के अपनी शिफ्ट खत्म होने के बावजूद रुके रहे।


इस महान सितारे ने 4 फरवरी 2002 को दिल का दौरा पड़ने से दादर की चॉल में अंतिम सांस ली। 2016 में उनके संघर्षपूर्ण जीवन पर आधारित एक मराठी बायोपिक 'एक अलबेला' रिलीज हुई, जिसमें मंगेश देसाई ने उनका किरदार निभाया।


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