बाबूराव पेंटर: भारतीय सिनेमा के पहले विजुअल आर्टिस्ट की अनकही कहानी
बाबूराव पेंटर का प्रारंभिक जीवन
बाबूराव पेंटर का जन्म 3 जून 1890 को कोल्हापुर में एक पारंपरिक शिल्पकार परिवार में हुआ। उनके घर में बढ़ईगिरी, लोहारी, नक्काशी और चित्रकला का माहौल था, जिसने उन्हें बिना किसी औपचारिक शिक्षा के कला और विज्ञान के बीच संबंध स्थापित करने में मदद की।
स्वदेशी तकनीक की ओर कदम
जब विदेशी कैमरा तकनीक के दरवाजे बंद हो गए, तब बाबूराव ने आत्मनिर्भरता का रास्ता अपनाया। अपने शिष्य वी. जी. दामले और मित्र ज्ञानबा सुतार के साथ मिलकर उन्होंने कोल्हापुर में साधारण मशीन पर दो साल तक मेहनत की।
उन्होंने कबाड़ बाजार से एक पुराना प्रोजेक्टर खरीदा और उसके गियर और चक्रों का अध्ययन कर, 1918 में भारत का पहला स्वदेशी 'मोशन पिक्चर कैमरा' बनाया। यह कैमरा एक सेकंड में 16 बार लेंस को खोल और बंद कर सकता था।
सिनेमा में क्रांति
इस कैमरे की पहली परीक्षा रंकाला तालाब में बच्चों और पंचगंगा नदी के किनारे कपड़े धोती महिलाओं के दृश्यों को रिकॉर्ड करके की गई। इस सफलता के बाद, 1 दिसंबर 1918 को 'महाराष्ट्र फिल्म कंपनी' की स्थापना हुई।
कोल्हापुर के छत्रपति शाहू महाराज के प्रगतिशील विचारों ने बाबूराव को प्रेरित किया। महाराज ने उन्हें सिनेमा के प्रयोग के लिए भूमि और बिजली का जनरेटर प्रदान किया।
नवाचार और योगदान
उस समय सिनेमा में पुरुष ही महिलाओं के किरदार निभाते थे, लेकिन बाबूराव ने इस परंपरा को तोड़ दिया। वे केवल एक फिल्म निर्देशक नहीं थे, बल्कि भारतीय सिनेमा के पहले विजुअल आर्टिस्ट भी थे।
उन्होंने 'स्टोरीबोर्डिंग' तकनीक को पेश किया, जिससे शूटिंग से पहले हर शॉट का स्केच तैयार किया जाता था। इस तकनीक की प्रशंसा बाद में विश्व प्रसिद्ध फिल्मकार सर्गेई आइंस्टीन ने भी की।
बाबूराव का विरासत
1921-22 में, वे दर्शकों को आकर्षित करने के लिए बहुपृष्ठीय 'कार्यक्रम पुस्तिकाएं' बांटने वाले पहले निर्माता बने। 1924 में आई फिल्म 'कल्याण खजिना' का पोस्टर आज भी भारतीय सिनेमा का सबसे पुराना जीवित चित्र-पोस्टर माना जाता है।
उनका स्टूडियो भारतीय सिनेमा की पहली व्यावहारिक एकेडमी थी, जिसने 500 से अधिक दिग्गजों को तैयार किया। उनके शिष्यों ने 1 जून 1929 को 'प्रभात फिल्म कंपनी' की स्थापना की।
अंतिम दिन
हालांकि 1931 में महाराष्ट्र फिल्म कंपनी बंद हो गई, बाबूराव ने 1947 में वी. शांतराम के आग्रह पर 'लोकशाहीर रामजोशी' का निर्देशन किया। 16 जनवरी 1954 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका स्वदेशी स्वाभिमान आज भी भारतीय सिनेमा में जीवित है।
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