पंडित मुखराम शर्मा: जब लेखकों की कलम से चलती थीं फिल्में
भारतीय सिनेमा के स्तंभ: पंडित मुखराम शर्मा
मुंबई, 29 मई। आजकल भारतीय सिनेमा में अभिनेता और निर्देशक की चर्चा अधिक होती है, लेकिन लेखकों का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। एक समय ऐसा था जब फिल्मों की सफलता का मुख्य आधार उनके लेखकों पर निर्भर करता था। उस समय पंडित मुखराम शर्मा का नाम एक ऐसा था, जिसकी उपस्थिति ही फिल्म की सफलता की गारंटी मानी जाती थी।
पंडित मुखराम शर्मा ने हिंदी सिनेमा में कहानी, पटकथा और संवाद लेखन को एक नई पहचान दी। उन्होंने न केवल फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी, बल्कि लेखकों को वह सम्मान भी दिलाया जो पहले कभी नहीं मिला था। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि फिल्म के पोस्टरों पर बड़े अक्षरों में लिखा जाता था, “पंडित मुखराम शर्मा की फिल्म।”
पंडित मुखराम शर्मा का जन्म 30 मई 1909 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के परीक्षितगढ़ क्षेत्र के गांव पूठी में हुआ। वे हिंदी और संस्कृत के विद्वान थे। अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मेरठ में शिक्षक के रूप में कार्य शुरू किया, लेकिन उनका मन हमेशा फिल्मों और लेखन की ओर था। उन्हें कहानी और कविताएं लिखने का शौक था, और धीरे-धीरे उन्होंने फिल्मों के लिए लिखने का सपना देखना शुरू कर दिया।
1939 में, वह अपने परिवार के साथ मुंबई आए, लेकिन शुरुआती दिनों में उन्हें काफी संघर्ष का सामना करना पड़ा। काम न मिलने के कारण वे पुणे चले गए, जहां उन्होंने प्रसिद्ध फिल्मकार वी. शांताराम की प्रभात फिल्म कंपनी में कलाकारों को हिंदी उच्चारण सिखाने का कार्य किया। इस काम के लिए उन्हें मामूली वेतन मिलता था, लेकिन यहीं से उनकी फिल्मी यात्रा की शुरुआत हुई।
मुखराम शर्मा को फिल्मों में पहला बड़ा अवसर 1942 में मिला, जब उन्होंने फिल्म ‘दस बजे’ के लिए गीत और संवाद लिखे। फिल्म सफल रही, और इसके बाद उन्हें लगातार काम मिलने लगा। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली। ‘विष्णु भगवान’, ‘नल-दमयंती’, ‘औलाद’, ‘एक ही रास्ता’, ‘साधना’, ‘धूल का फूल’, ‘वचन’, ‘संतान’ और ‘अभिमान’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख लेखकों में शामिल कर दिया।
1959 में रिलीज हुई ‘धूल का फूल’ विशेष रूप से चर्चित रही। यह यश चोपड़ा की बतौर निर्देशक पहली फिल्म थी, और इसकी कहानी, पटकथा व संवाद पंडित मुखराम शर्मा ने लिखे थे। इसके अलावा, उन्होंने दक्षिण भारत के बड़े बैनरों के लिए भी कई सफल हिंदी फिल्में लिखीं। ‘घराना’, ‘गृहस्थी’, ‘हमजोली’, ‘जीने की राह’, ‘राजा और रंक’ जैसी फिल्मों की सफलता में उनकी लेखनी का बड़ा योगदान रहा।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे पारिवारिक और सामाजिक कहानियों को सरल और भावनात्मक तरीके से प्रस्तुत करते थे। उनकी कहानियां आम लोगों की जिंदगी से जुड़ी होती थीं, जिससे दर्शक आसानी से जुड़ जाते थे।
पंडित मुखराम शर्मा को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए कई बड़े सम्मान भी मिले। उन्हें ‘औलाद’, ‘वचन’ और ‘साधना’ जैसी फिल्मों के लिए तीन फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुए। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
इतनी सफलता और लोकप्रियता के बावजूद, पंडित मुखराम शर्मा ने एक साधारण जीवन जीने का निर्णय लिया। उन्होंने तय किया था कि 70 वर्ष की उम्र के बाद वह फिल्म इंडस्ट्री से दूरी बना लेंगे, और उन्होंने ऐसा ही किया।
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