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नूतन: जब बदसूरत समझा गया, फिर भी बनीं हिंदी सिनेमा की चमकती सितारा!

नूतन, हिंदी सिनेमा की एक चमकती सितारा, जिन्होंने अपने जीवन में कई संघर्षों का सामना किया। अपने रंग-रूप को लेकर असहज रहने के बावजूद, उन्होंने सिनेमा में अपनी पहचान बनाई। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और कैसे उनकी मां ने उन्हें प्रेरित किया। इस लेख में हम नूतन के संघर्ष और सफलता की यात्रा पर प्रकाश डालेंगे।
 
नूतन: जब बदसूरत समझा गया, फिर भी बनीं हिंदी सिनेमा की चमकती सितारा!

नूतन का संघर्ष और सफलता




मुंबई, 20 फरवरी। "तुझे क्या सुनाऊं मैं दिलरुबा, तेरे सामने मेरा हाल है, तेरी इक निगाह की बात है, मेरी जिंदगी का सवाल है..." यह गाना 1958 में आई फिल्म 'आखिरी दांव' से है, जिसमें नूतन की मासूमियत ने दर्शकों का दिल जीत लिया।


हालांकि, क्या आप जानते हैं कि नूतन अपने रूप-रंग को लेकर हमेशा असहज महसूस करती थीं? 21 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि पर, हम उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करेंगे।


नूतन ने हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाई और चार दशकों तक सक्रिय रहीं। कई बड़े सितारे उनकी सादगी और सुंदरता के दीवाने थे, लेकिन खुद नूतन को अपनी खूबसूरती पर विश्वास नहीं था। उनके परिवार के लोग अक्सर उनके रंग-रूप पर ताने मारते थे। एक महिला, जो उनकी मां शोभना सामर्थ की दोस्त थी, ने उन्हें बदसूरत तक कह दिया था।


नूतन ने एक इंटरव्यू में बताया कि उन्हें फिल्मों में आने का बहुत शौक था, लेकिन बचपन से ही उन्हें यह महसूस कराया गया कि वे सुंदर नहीं हैं। उनकी मां की सहेली ने कहा था, "तुम्हारी बेटी तुम्हारी जितनी खूबसूरत नहीं है।" यह सुनकर नूतन को बहुत बुरा लगा, लेकिन उनकी मां ने उन्हें समझाया कि इसे सकारात्मक रूप में लें।


शोभना सामर्थ ने नूतन को प्रोत्साहित करने के लिए कड़ी मेहनत की। उन्होंने नूतन को पढ़ाई के लिए विदेश भेजा, उनका वजन कम करवाया और अंततः उन्हें फिल्मों में स्थापित करने के लिए खुद एक फिल्म बनाई। नूतन ने बाल कलाकार के रूप में 'नल दमयन्ती' से डेब्यू किया और फिर 'नगीना' में नजर आईं।


14 साल की उम्र में उन्हें आसिफ की फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में अनारकली का रोल ऑफर हुआ, लेकिन आत्मविश्वास की कमी के कारण उन्होंने इसे ठुकरा दिया। कुछ चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में काम करने के बाद, नूतन ने एक्टिंग की सभी विधाओं को सीखने के लिए विदेश जाने का निर्णय लिया। वहां उन्होंने न केवल पढ़ाई की, बल्कि अपनी अंग्रेजी भी सुधार ली। 1955 में 'सीमा' के साथ उन्होंने वापसी की और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।


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