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धर्मेंद्र की पहली फिल्म की साइनिंग मनी ने कैसे बदल दी उनकी किस्मत?

धर्मेंद्र की फिल्मी यात्रा संघर्ष और मेहनत से भरी रही है। उनकी पहली फिल्म की साइनिंग मनी की कहानी जानें, जिसमें उन्हें केवल 51 रुपए मिले थे। यह घटना उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। जानें कैसे उन्होंने अपने शुरुआती दिनों में संघर्ष किया और कैसे उनके पहले प्रोड्यूसर ने उनकी मदद की।
 
धर्मेंद्र की पहली फिल्म की साइनिंग मनी ने कैसे बदल दी उनकी किस्मत?

धर्मेंद्र का संघर्ष और पहली फिल्म की कहानी




नई दिल्ली, 24 नवंबर। बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र की यात्रा हमेशा से मेहनत और संघर्ष से भरी रही है। पंजाब के एक छोटे से शहर से निकलकर, उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि उनका सफर इतना लंबा और सफल होगा।


धर्मेंद्र ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम एक राष्ट्रीय प्रतिभा खोज प्रतियोगिता के माध्यम से रखा, जो उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। वह अपने पहले प्रोड्यूसर से मिलने के लिए उत्साहित थे और साइनिंग मनी का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे।


उन्होंने उम्मीद की थी कि उन्हें अच्छी खासी रकम मिलेगी, लेकिन वास्तविकता कुछ और ही थी।


उनकी पहली साइनिंग मनी के रूप में उन्हें केवल 51 रुपए मिले। धर्मेंद्र ने बताया कि उनके पहले प्रोड्यूसर टी.एम. बिहारी और उनके सहयोगी ठक्कर ने अपनी जेबें खाली करके उन्हें यह राशि दी थी। बिहारी ने 17 रुपए और ठक्कर ने बाकी का भुगतान किया।


धर्मेंद्र ने कहा कि वह 500 रुपए की उम्मीद में बैठे थे, लेकिन उन्हें इतनी छोटी राशि मिली। यह घटना उनके शुरुआती संघर्षों की सबसे प्यारी यादों में से एक बन गई।


जब धर्मेंद्र ने फिल्म 'शोला और शबनम' साइन की, तब उनकी डेब्यू फिल्म 'दिल भी तेरा, हम भी तेरे' रिलीज हुई थी। यह फिल्म अर्जुन हिंगोरानी द्वारा निर्देशित थी, जिसमें बलराज सहनी और कुमकुम भी शामिल थे।


धर्मेंद्र ने अपने शुरुआती दिनों के लिए हिंगोरानी का आभार व्यक्त किया, क्योंकि उनके पास न तो घर था और न ही खाने के लिए पैसे। हिंगोरानी ने उन्हें अपने घर में रहने की अनुमति दी और खाने का भी इंतजाम किया।


हिंगोरानी ने धर्मेंद्र के लिए रेस्टोरेंट में खास व्यवस्था की थी, जिसमें वह रोजाना दो स्लाइस ब्रेड, बटर और एक कप चाय मुफ्त में ले सकते थे। उन्होंने इस सहायता को अपने जीवन का अनमोल सहयोग बताया।


धर्मेंद्र और हिंगोरानी का संबंध केवल पहली फिल्म तक सीमित नहीं रहा। हिंगोरानी की फिल्मों में एक खास बात यह थी कि उनके अधिकांश फिल्म के नाम तीन शब्दों के होते थे और हर शब्द का पहला अक्षर 'के' होता था। धर्मेंद्र हमेशा मुख्य भूमिका में नजर आए। उदाहरण के लिए, 'कब? क्यों? और कहां?' (1970), 'कहानी किस्मत की' (1973), 'खेल खिलाड़ी का' (1977), 'कातिलों के कातिल' (1981), 'करिश्मा कुदरत का' (1985), 'कौन करे कुर्बानी' (1991), और 'कैसे कहूं कि… प्यार है' (2003); हालांकि, फिल्म 'सल्तनत' (1986) इस नियम से अलग थी।


इन फिल्मों में धर्मेंद्र के साथ अन्य बड़े अभिनेता जैसे ऋषि कपूर, मिथुन चक्रवर्ती और गोविंदा ने भी काम किया। बाद में, हिंगोरानी की कुछ फिल्मों में धर्मेंद्र के बेटे सनी देओल ने भी अभिनय किया।


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