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तलत महमूद: कैसे 6 रुपए से शुरू हुआ एक संगीत का अद्भुत सफर?

तलत महमूद, एक अद्वितीय आवाज, जिन्होंने भारतीय फिल्म संगीत में अपनी छाप छोड़ी। महज 6 रुपए से शुरू हुआ उनका सफर लाखों दिलों तक पहुंचा। जानें उनकी यात्रा, गाने और उनके योगदान के बारे में।
 
तलत महमूद: कैसे 6 रुपए से शुरू हुआ एक संगीत का अद्भुत सफर?

तलत महमूद का संगीत सफर




मुंबई, 23 फरवरी। भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में कुछ आवाजें कभी पुरानी नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ और भी गहरी होती जाती हैं। ऐसी ही एक आवाज थी तलत महमूद की। उनकी गायकी में दर्द, मिठास और शायरी की खूबसूरती समाई हुई थी। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस आवाज ने लाखों दिलों को छुआ, उसे अपने पहले गाने के लिए केवल छह रुपए मिले थे।


तलत महमूद का जन्म 24 फरवरी 1924 को लखनऊ में एक रूढ़िवादी मुस्लिम परिवार में हुआ। उनके परिवार में संगीत को एक अच्छा पेशा नहीं माना जाता था, फिर भी बचपन से ही उन्हें गाने का शौक था। वे रातभर चलने वाले संगीत कार्यक्रमों में बैठकर बड़े गायकों की गायकी को ध्यान से सुनते थे। उनकी आवाज में एक अनोखी मिठास थी, जो आगे चलकर उनकी पहचान बनी।


सिर्फ 16 साल की उम्र में उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो, लखनऊ से गाना शुरू किया। वे मीर और दाग जैसे शायरों की गज़लें गाते थे। 1941 में उनका पहला गाना रिकॉर्ड हुआ, जो ग्रामोफोन कंपनी एचएफवी के लिए था, और इसके लिए उन्हें महज 6 रुपए का मेहनताना मिला। आज की दृष्टि से यह राशि छोटी लगती है, लेकिन इसी छोटे से भुगतान ने उनके बड़े सफर की शुरुआत की। उनकी आवाज इतनी पसंद की गई कि लोग उनसे और गानों की मांग करने लगे।


1944 में उनका गाना 'तस्वीर तेरी दिल मेरा बहला न सकेगी' काफी प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद वे कलकत्ता चले गए, जहां उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय भी किया और गाने भी गाए। उस समय वे 'तपन कुमार' नाम से भी गाते थे। 1949 में वे मुंबई आए और यहीं से उनका असली सुनहरा दौर शुरू हुआ। 1950 और 1960 के दशक में वे हिंदी फिल्मों के सबसे पसंदीदा गायकों में से एक बन गए। उनके गाने जैसे 'इतना न मुझसे तू प्यार बढ़ा', 'फिर वही शाम, वही गम', 'ये हवा ये रात', 'मिलते ही आंखें दिल हुआ दिवाना' और 'तस्वीर बनाता हूं' लोगों के दिलों में बस गए।


उनकी आवाज अभिनेता दिलीप कुमार पर विशेष रूप से जंचती थी। उन्होंने दिलीप कुमार के लिए कई गानों में अपनी आवाज दी, जिनमें 'हमसे आया न गया', 'ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल', 'हम दर्द के मारों का', 'कोई नहीं मेरा इस दुनिया में', और 'सीने में सुलगते हैं अरमां' जैसे गाने शामिल हैं।


तलत महमूद की एक खासियत थी कि वे गानों के बोल को बहुत ध्यान से पढ़ते थे। अगर उन्हें शब्द पसंद नहीं आते थे, तो वे गाना गाने से मना कर देते थे। हालांकि, समय के साथ संगीत का रुख बदला और तेज, ऊंची आवाज वाले गीतों की मांग बढ़ गई। इससे उनका करियर थोड़ी धीमी गति से आगे बढ़ा, लेकिन उनकी पहचान कभी कम नहीं हुई।


उन्हें 1992 में भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, जो उनके लंबे और शानदार योगदान की पहचान थी। उन्होंने लगभग चार दशकों तक गाया और सैकड़ों गीतों को अपनी आवाज दी।


9 मई 1998 को 74 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी आवाज आज भी रेडियो, टीवी और संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है।


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