डैनी डेन्जोंगपा: 1,500 रुपए लेकर आए थे गजल सिंगर बनने, लेकिन बने बॉलीवुड के खतरनाक विलेन!
डैनी डेन्जोंगपा का अनोखा सफर
मुंबई, 24 फरवरी। बॉलीवुड में कई ऐसे सितारे हैं जिनकी किस्मत ने उन्हें अनजाने रास्तों पर पहुंचाया। ऐसा ही कुछ डैनी डेन्जोंगपा के साथ हुआ। डैनी ने मुंबई में गजल सिंगर बनने का सपना लेकर 1,500 रुपए के साथ कदम रखा, लेकिन उनकी किस्मत ने उन्हें एक विलेन बना दिया।
डैनी का जन्म 25 फरवरी 1948 को सिक्किम के गंगटोक में हुआ। उनका असली नाम शेरिंग फिनसो था। बचपन से ही उन्हें संगीत और कला में गहरी रुचि थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने एफटीआईआई में अभिनय का प्रशिक्षण लिया और फिर मुंबई का रुख किया।
मुंबई में डैनी के शुरुआती दिन चुनौतीपूर्ण थे। उनके पास केवल 1,500 रुपए थे और वे गजल सिंगर के रूप में पहचान बनाना चाहते थे। लेकिन किस्मत ने उन्हें विलेन के किरदार में ढाल दिया। शुरुआती दिनों में, उन्हें फिल्म स्टूडियो और निर्देशकों के घरों के चक्कर लगाने पड़े। एक बार, जब वे निर्देशक मोहन कुमार के बंगले पहुंचे, तो उन्हें गार्ड की नौकरी का प्रस्ताव मिला, जो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने ठान लिया कि एक दिन वे इतने बड़े स्टार बनेंगे कि उस बंगले के पास उनका भी बंगला होगा, और यह सच हुआ।
डैनी ने अपने करियर की शुरुआत 1971 में फिल्म 'मेरे अपने' से की, जिसमें उन्होंने सकारात्मक भूमिका निभाई। लेकिन उनकी असली पहचान 1973 की फिल्म 'धुंध' में नकारात्मक किरदार निभाने के बाद बनी। उनके विलेन के किरदार दर्शकों में डर पैदा करते थे। इसके बाद उन्होंने कांचा चीना, बख्तावर, खुदा बख्श जैसे कई यादगार किरदार निभाए।
दिलचस्प बात यह है कि डैनी को 1975 में 'शोले' में गब्बर सिंह का किरदार निभाने का प्रस्ताव मिला था, लेकिन उन्होंने डेट्स की कमी के कारण इसे ठुकरा दिया।
डैनी ने हिंदी फिल्मों के अलावा नेपाली, तमिल, तेलुगु और हॉलीवुड में भी काम किया। 2003 में, उन्होंने हॉलीवुड फिल्म 'सेवन ईयर्स इन तिब्बत' में ब्रैड पिट के साथ अभिनय किया और दर्शकों से सराहना प्राप्त की।
अपने अभिनय के लिए, डैनी को 2003 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी गावा डेन्जोंगपा, सिक्किम की राजकुमारी हैं, और उन्होंने 1990 में शादी की।
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