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क्या है पंकज त्रिपाठी की नई फिल्म 'पारिवारिक मनोरंजन' का खासियत? जानें अभिनेता की तैयारी के बारे में!

पंकज त्रिपाठी अपनी नई फिल्म 'पारिवारिक मनोरंजन' की रिलीज की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक अभिनेता की तैयारी जीवनभर चलती है और किरदार निभाने के लिए समय की आवश्यकता होती है। पंकज ने दर्शकों की पसंद और फिल्म की विशेषताओं पर भी चर्चा की। जानें उनके विचार और फिल्म के बारे में और अधिक जानकारी।
 

पंकज त्रिपाठी की नई फिल्म की तैयारी

मुंबई, 7 नवंबर। अभिनेता पंकज त्रिपाठी अपनी आगामी फिल्म 'पारिवारिक मनोरंजन' के लिए तैयारियों में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि एक अभिनेता की तैयारी किसी किरदार के लिए शुरू होने से पहले ही शुरू हो जाती है।


पंकज ने मुंबई के गोरेगांव ईस्ट में अपनी सह-कलाकार अदिति राव हैदरी के साथ बातचीत में बताया कि किसी किरदार को निभाने के लिए निश्चित समय की आवश्यकता होती है, लेकिन एक अभिनेता की तैयारी जीवनभर चलती रहती है। यह एक निरंतर प्रक्रिया है।


उन्होंने कहा, "किसी किरदार को निभाने के लिए आपको एक, दो या तीन हफ्ते का समय मिलता है। आप फिल्म की कहानी पढ़ते हैं और उस किरदार के करीब पहुंचने की कोशिश करते हैं। यह तो कुछ हफ्तों की बात है, लेकिन एक अभिनेता को तैयार होने में वर्षों लग जाते हैं। जैसे एक कुर्सी बनाने में 4 दिन लगते हैं, लेकिन उस बढ़ई को उसे सही तरीके से बनाना सीखने में 4 वर्ष लगते हैं।"


इसके बाद, उन्होंने दर्शकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए काम करने के चलन पर चर्चा की। उन्होंने कहा, "एक अभिनेता के लिए यह 15-20 वर्षों की साधना होती है। कई बार चीजें उलझ जाती हैं और आपको अपनी कला में और भी मेहनत करनी पड़ती है। हम अक्सर इस जाल में फंस जाते हैं कि दर्शक क्या चाहते हैं।"


उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, "भारत में हर किसी को हर तरह का खाना पसंद नहीं आता। अगर मुझे कोई खाना पसंद नहीं है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह खराब है। इसका बस इतना सा मतलब है कि मुझे उसका स्वाद पसंद नहीं है। इंटरनेट पर, अगर किसी को कोई कहानी पसंद नहीं आती, तो वे तुरंत लिख देते हैं कि यह बहुत खराब है। हो सकता है कि आगे चलकर आपको उस कहानी में भी दिलचस्पी आने लगे।"


पंकज ने ऐसी फिल्मों को 'पारिवारिक मनोरंजन' कहा और इन्हें 'कंफर्ट फूड' से तुलना की। उन्होंने कहा, "यह बिल्कुल घर के खाने जैसा सिनेमा है। यह एक साफ-सुथरी फिल्म है, जिसमें किसी डिस्क्लेमर की जरूरत नहीं है। आजकल दर्शकों का ध्यान कम समय तक टिक पाता है, इसलिए फिल्मों की एडिटिंग तेज करनी पड़ती है, लेकिन इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है। मैंने अपने डायरेक्टर से कहा कि अगर फिल्म की एडिटिंग थोड़ी धीमी होती तो मुझे और भी अच्छा लगता। यह कहानी ही कुछ ऐसी है। हमें लगा कि 'मसालेदार' फिल्में तो हर जगह मिल जाती हैं, तो क्यों न दर्शकों को घर का बना खाना परोसा जाए। यह घर के बने खाने जैसा सिनेमा है।"


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