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क्या हिंदी सिनेमा में बच्चों के लिए फिल्में बनाना हो गया है मुश्किल? जानें निर्देशक रवि उदयवार की राय

हिंदी सिनेमा में बच्चों के लिए फिल्में बनाने की कमी पर फिल्म निर्देशक रवि उदयवार ने अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने बताया कि कैसे आजकल की फिल्में मासूमियत और सादगी से दूर होती जा रही हैं। रवि का मानना है कि बच्चों के लिए ऐसी कहानियों की आवश्यकता है जो उनकी भावनाओं को समझें। उन्होंने दर्शकों की बदलती प्राथमिकताओं और सरल प्रेम कहानियों की मांग पर भी प्रकाश डाला। क्या सिनेमा को अपनी रफ्तार कम करके मासूमियत को वापस लाना चाहिए? जानें पूरी कहानी में।
 
क्या हिंदी सिनेमा में बच्चों के लिए फिल्में बनाना हो गया है मुश्किल? जानें निर्देशक रवि उदयवार की राय

बच्चों के लिए फिल्मों की कमी पर चर्चा


मुंबई, 1 मार्च। हिंदी फिल्म उद्योग ने समय के साथ कई बदलाव देखे हैं। कहानियों का स्वरूप, तकनीकी पहलू और दर्शकों की प्राथमिकताएं सभी में परिवर्तन आया है। लेकिन बच्चों के लिए विशेष रूप से बनाई जाने वाली फिल्मों की कमी स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है।


एक समय था जब परिवार के साथ देखने के लिए साधारण फिल्में बनाई जाती थीं। आजकल बड़े बजट और एक्शन से भरी कहानियों का बोलबाला है, जिससे बच्चों के लिए फिल्में बनाना कम हो गया है। इस विषय पर फिल्म निर्देशक रवि उदयवार ने अपने विचार साझा किए हैं।


रवि उदयवार ने कहा, "हिंदी सिनेमा में बच्चों की फिल्मों की कमी स्पष्ट है। हमने बच्चों के लिए फिल्में बनाना लगभग बंद कर दिया है। मुझे लगता है कि बच्चों के लिए ऐसी कहानियों की आवश्यकता है जो उनकी दुनिया को समझें और उनकी मासूमियत को बनाए रखें।"


उन्होंने आगे कहा, "आजकल की फिल्मों में मासूमियत की कमी होती जा रही है। मैं अपने कलाकारों से हमेशा कहता हूं कि रोमांस में सादगी और मासूमियत को वापस लाने की कोशिश करें। पहले की प्रेम कहानियों में एक सहजता होती थी, जो दिल को छू जाती थी। अब सब कुछ बहुत दिखावटी हो गया है।"


रवि ने यह भी बताया कि जब बच्चों और किशोर दर्शकों को उनकी पसंद की फिल्में नहीं मिलतीं, तो वे अन्य विकल्पों की ओर बढ़ते हैं। आजकल कई युवा दर्शक के-ड्रामा और विदेशी कंटेंट देख रहे हैं, क्योंकि वहां उन्हें सरल और सच्ची कहानियां मिलती हैं।


उन्होंने कहा, "दर्शकों की मांग है कि उन्हें जरूरत से ज्यादा ड्रामा न दिया जाए। वे बस दो लोगों के बीच पनपते रिश्ते को महसूस करना चाहते हैं। मेरी फिल्मों में यही कोशिश होती है कि कहानी को थोड़ा धीमा रखा जाए, ताकि दर्शक किरदारों के साथ जुड़ सकें। कभी-कभी सिनेमा को रफ्तार कम करके भी कहानी दिखानी चाहिए।"


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