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क्या आप जानते हैं रीता भादुड़ी की अनसुनी कहानी? जानें इस अदाकारा के संघर्ष और सफलता के बारे में!

रीता भादुड़ी, एक ऐसी अदाकारा जिनका नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है, ने अपने करियर में कई छोटे-बड़े किरदार निभाए। उन्होंने न केवल हिंदी फिल्मों में, बल्कि गुजराती सिनेमा में भी अपनी पहचान बनाई। जानें उनके संघर्ष, सफलता और निजी जीवन के बारे में, जिसमें उन्होंने कभी शादी नहीं की और अंततः गंभीर बीमारी से जूझते हुए 62 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कहा।
 

रीता भादुड़ी: एक अद्वितीय अदाकारा की कहानी


नई दिल्ली, 16 जुलाई। बॉलीवुड की चमक-दमक में कई ऐसे चेहरे होते हैं जो अक्सर सुर्खियों से दूर रहते हैं, लेकिन जब वे पर्दे पर आते हैं, तो पूरी कहानी में जान डाल देते हैं। रीता भादुड़ी भी ऐसे ही कलाकारों में से एक थीं। उन्होंने फिल्मों में हीरोइन बनने का सपना देखा, लेकिन वह उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाईं। फिर भी, उन्होंने अपने अंतिम क्षणों तक काम करना जारी रखा। उनके द्वारा निभाए गए हर छोटे-बड़े किरदार ने उन्हें एक खास पहचान दिलाई, जिससे आज भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।


रीता भादुड़ी का जन्म 4 नवंबर 1955 को हुआ था। उन्हें अभिनय का माहौल अपने परिवार से मिला, क्योंकि उनकी मां भी फिल्म इंडस्ट्री में काम कर चुकी थीं। बचपन से ही रीता को कैमरे और अभिनय की दुनिया का आकर्षण था। इस जुनून को पूरा करने के लिए उन्होंने पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से अभिनय की शिक्षा ली।


उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1968 में फिल्म 'तेरी तलाश में' से की। इसके बाद 1974 में फिल्म 'आइना' में उन्हें राजेश खन्ना और मुमताज जैसे बड़े सितारों के साथ काम करने का अवसर मिला। हालांकि उनका रोल छोटा था, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ने दर्शकों का ध्यान खींचा।


1975 में आई सुपरहिट फिल्म 'जूली' उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने मुख्य किरदार की दोस्त का रोल निभाया और उन पर फिल्माया गया गीत 'ये रातें नई पुरानी' भी काफी लोकप्रिय हुआ। इसके बाद उन्होंने 'सावन को आने दो', 'अनुरोध', 'बेटा', 'हम आपके हैं कौन', 'राजा', 'क्या कहना', 'कभी हां कभी ना' और 'दिल विल प्यार व्यार' जैसी कई फिल्मों में दमदार सहायक भूमिकाएं निभाईं।


रीता भादुड़ी की खासियत यह थी कि वह जिस भी किरदार को निभाती थीं, उसमें पूरी तरह समाहित हो जाती थीं। चाहे वह मां का रोल हो, बहन का या फिर किसी परिवार की समझदार महिला का, वह हर किरदार को इतना सहज बना देती थीं कि दर्शकों को वह अपने घर की सदस्य जैसी लगती थीं।


बहुत कम लोग जानते हैं कि हिंदी फिल्मों के अलावा रीता भादुड़ी ने गुजराती सिनेमा में भी शानदार काम किया। 1976 में आई फिल्म 'लाखो फुलानी' की सफलता के बाद वह लगभग आठ साल तक गुजराती फिल्मों की लोकप्रिय हीरोइन रहीं। वहां उन्होंने बतौर लीड एक्ट्रेस कई हिट फिल्में दीं और अपनी अलग पहचान बनाई।


90 के दशक में जब टीवी का दौर शुरू हुआ, तो रीता ने छोटे पर्दे पर भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी', 'साराभाई वर्सेस साराभाई', 'कुमकुम', 'अमानत', 'ससुराल गेंदा फूल' और 'निमकी मुखिया' जैसे धारावाहिकों में उनके अभिनय को खूब सराहा गया। खासतौर पर 'निमकी मुखिया' में दादी का किरदार उनके आखिरी यादगार रोल्स में शामिल है।


रीता भादुड़ी ने अपने करियर में लगभग 70 फिल्मों और 20 से अधिक टीवी धारावाहिकों में काम किया। फिल्म 'राजा' में उनके शानदार अभिनय के लिए उन्हें फिल्मफेयर के सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया था।


जहां उनका करियर सफल रहा, वहीं निजी जीवन में उन्होंने अकेले रहने का निर्णय लिया। उन्होंने कभी शादी नहीं की। जीवन के अंतिम वर्षों में वह डायबिटीज और किडनी की गंभीर बीमारी से जूझती रहीं। इलाज के लिए उन्हें मुंबई के अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन 17 जुलाई 2018 को 62 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।


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