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कौन हैं शास्त्रीय संगीत के दिग्गज बड़े गुलाम अली खां? जानें उनकी अनकही कहानी

बड़े गुलाम अली खां, जिन्हें 'तानसेन' कहा जाता है, शास्त्रीय संगीत के एक महान उस्ताद थे। उनकी गायकी और ठुमरी की अनोखी शैली आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हुई है। 2 अप्रैल को उनकी जयंती मनाई जाती है। जानें उनके जीवन, संगीत यात्रा और उनके योगदान के बारे में।
 
कौन हैं शास्त्रीय संगीत के दिग्गज बड़े गुलाम अली खां? जानें उनकी अनकही कहानी

बड़े गुलाम अली खां: शास्त्रीय संगीत के अनमोल रत्न


नई दिल्ली, 1 अप्रैल। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में कुछ नाम ऐसे हैं, जिनकी पहचान समय के साथ और भी मजबूत होती गई है। 20वीं सदी के प्रसिद्ध उस्ताद बड़े गुलाम अली खां भी ऐसे ही एक महान कलाकार हैं, जिन्हें 'तानसेन' की उपाधि दी गई। उनकी गायकी और ठुमरी की विशेष शैली आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है। 2 अप्रैल को उनकी जयंती मनाई जाती है।


बड़े गुलाम अली खां पटियाला घराने के प्रमुख गायक थे। उन्होंने खयाल और ठुमरी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनकी आवाज इतनी मधुर और लचीली थी कि उन्होंने फिल्म 'मुगल-ए-आजम' में तानसेन का किरदार निभाया। उनके गाए कई गाने जैसे 'शुभ दिन आयो' और 'प्रेम जोगन बनके' आज भी लोगों की जुबान पर हैं।


उनका जन्म 2 अप्रैल 1902 को पाकिस्तान के लाहौर के पास स्थित गांव केसुर में हुआ था। संगीत उनके परिवार की विरासत थी। उनके पिता, अली बख्श खां, एक प्रसिद्ध सारंगी वादक थे, जबकि उनके चाचा, काले खां, भी गायक थे। उन्होंने अपने बचपन में ही संगीत की कठिनाइयों का सामना किया और प्रतिदिन 20 घंटे तक रियाज किया। 1947 में बंटवारे के बाद वे भारत आए और 1957 में भारतीय नागरिकता प्राप्त की।


एक बार पंडित जसराज ने एक भावुक घटना साझा की। 1960 में, जब जसराज मुंबई में थे, तो वे डॉक्टर मुकुंदलाल के साथ बड़े गुलाम अली खां से मिलने गए। उस समय खां साहब बीमार थे। जसराज और उनके साथी उनके पैर दबा रहे थे, तभी खां साहब भावुक होकर बोले, 'मेरा शागिर्द बन जा।' जसराज ने विनम्रता से कहा, 'चाचा जान, मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता।' यह सुनकर खां साहब की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने कहा, 'अल्लाह तेरी हर मुराद पूरी करे।'


जसराज ने बताया कि बड़े उस्ताद का शिष्य बनने का प्रस्ताव रखना और फिर भावुक होकर रोना उनकी संवेदनशीलता और संगीत के प्रति गहरी निष्ठा को दर्शाता है। उस समय जसराज अपने बड़े भाई पंडित मणिराम के शिष्य थे और मेवाती घराने की परंपरा का पालन कर रहे थे।


बड़े गुलाम अली खां ने ठुमरी में पंजाबी रंग भरा और खयाल की एक नई शैली विकसित की। उनकी गायकी साधारण लेकिन अत्यंत प्रभावशाली थी। उन्होंने सारंगी भी बजाई और फिल्मों में गाने से पहले मना कर दिया था, लेकिन बाद में 'मुगल-ए-आजम' में अपनी आवाज दी।


1962 में, खां साहब को संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड और पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।


उनका विवाह 1932 में अली जीवाई से हुआ था। उनके बेटे मुनव्वर अली खां भी एक शास्त्रीय गायक थे और अपने पिता के साथ कई कार्यक्रमों में भाग लेते थे। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां का निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हुआ।


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