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कौन हैं मास्टर सलीम? जानें उनकी प्रेरणादायक यात्रा और संगीत में योगदान

मास्टर सलीम, जिन्हें दुनिया भर में उनकी अद्वितीय गायकी के लिए जाना जाता है, ने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। मात्र 6 साल की उम्र में संगीत की शिक्षा शुरू करने वाले सलीम ने अपने पिता के कड़े अनुशासन को अपनी सफलता का मुख्य कारण माना है। उनकी यात्रा में कई महत्वपूर्ण मोड़ आए, जैसे कि उनकी आवाज में बदलाव और बॉलीवुड में प्रवेश। जानें उनके संघर्ष और सफलता की कहानी, जो आज भी संगीत की दुनिया में एक प्रेरणा है।
 

मास्टर सलीम: संगीत की दुनिया में एक अद्वितीय नाम




मुंबई, 12 जुलाई। भारतीय संगीत के इतिहास में कुछ ऐसे अद्वितीय कलाकार हैं, जिन्होंने अपनी कला को व्यवसायिकता से ऊपर उठाकर एक आध्यात्मिक यात्रा में बदल दिया है। इनमें से एक हैं सलीम शहजादा, जिन्हें पूरी दुनिया 'मास्टर सलीम' के नाम से जानती है। केवल 6 साल की उम्र में, उनके पिता, प्रसिद्ध सूफी गायक उस्ताद पूरन शाह कोटी ने उन्हें शास्त्रीय और सूफियाना संगीत की शिक्षा देना शुरू किया।


लखनऊ में आयोजित 'देशज' सांस्कृतिक कार्यक्रम में मास्टर सलीम ने एक महत्वपूर्ण घटना साझा की। उन्होंने बताया कि जब वह मंच पर गा रहे थे और उनका सुर भटक गया, तो उनके पिता ने उन्हें दर्शकों के सामने ही टोक दिया। जब यह गलती फिर से हुई, तो उनके पिता ने सख्त चेतावनी दी कि 'सही गाओ, वरना परिणाम अच्छे नहीं होंगे।'


आज जब मास्टर सलीम वैश्विक मंचों पर अपनी गायकी का लोहा मनवाते हैं, तो वह अपने पिता के इस कड़े अनुशासन को अपनी सफलता का मुख्य कारण मानते हैं।


13 जुलाई 1980 को पंजाब के जालंधर जिले के शाहकोट में जन्मे मास्टर सलीम का पालन-पोषण एक संगीतपूर्ण वातावरण में हुआ। उनकी माता, माथरो, ने हमेशा कला को प्रोत्साहित किया और उनके छोटे भाई परवेज पेजी ने भी गायकी को अपना करियर बनाया।


सलीम की असाधारण प्रतिभा का पहला प्रमाण तब मिला जब उन्होंने 7 साल की उम्र में बठिंडा दूरदर्शन के उद्घाटन समारोह में 'चरखे दी घूक' नामक लोक गीत प्रस्तुत किया। इस प्रदर्शन ने पंजाब के दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और उन्हें 'मास्टर' की उपाधि से नवाजा। इसके बाद, 10 साल की उम्र में, उनका पहला आधिकारिक संगीत एल्बम 'चरखे दी घूक' 1990 में जारी हुआ, जिसने उन्हें एक राष्ट्रीय बाल कौतुक के रूप में स्थापित किया।


हालांकि, 1990 के दशक के अंत में उनकी आवाज में बदलाव आया, जिससे उनकी लोकप्रियता में गिरावट आई। लेकिन सलीम ने इस कठिन समय को अपनी साधना का माध्यम बनाया।


वर्ष 2000 में, उन्होंने दूरदर्शन के एक नववर्ष विशेष कार्यक्रम में सूफी गीत 'अज होना दीदार माही दा' के साथ वापसी की। इसके बाद, उन्होंने कई भक्ति एल्बम जारी किए, जैसे 'मेला मैया दा' (2004), जिसने उनके करियर को नई दिशा दी।


मास्टर सलीम ने बॉलीवुड में अपनी पहचान तब बनाई जब जालंधर के देवी तालाब मंदिर में एक माता के जागरण में उनकी प्रस्तुति को शंकर महादेवन ने देखा। उन्होंने उन्हें मुंबई बुलाया और फिल्म 'हे बेबी' (2007) के लिए 'मस्त कलंदर' गाने का मौका दिया। इसके बाद, उन्होंने कई हिट गाने दिए।


उन्हें 2008 में 'मां दा लाडला' और 2009 में 'आहुं आहुं' से बड़ी सफलता मिली। 2014 में उन्होंने अनमोल अलीशा सलीम से विवाह किया और 2021 में 'वॉयस ऑफ पंजाब सीजन 12' में मुख्य निर्णायक बने।


वर्तमान में, मास्टर सलीम संगीत की दुनिया में सक्रिय हैं और अपने नए गानों और लाइव कॉन्सर्ट के माध्यम से दर्शकों का मनोरंजन कर रहे हैं।


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