कौन हैं बांग्ला सिनेमा की पहली सुपरस्टार कानन देवी? जानें उनकी प्रेरणादायक कहानी!
कानन देवी: बांग्ला सिनेमा की पहली सुपरस्टार
मुंबई, 21 अप्रैल। भारतीय फिल्म उद्योग के प्रारंभिक दिनों में कई ऐसे कलाकार हुए, जिनकी जीवन गाथा किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं थी। उनमें से एक थीं कानन देवी, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों और समाज के विरोध के बावजूद अपनी एक अलग पहचान बनाई।
उन्हें बांग्ला सिनेमा की पहली सुपरस्टार अभिनेत्री माना जाता है। उस समय जब फिल्म इंडस्ट्री में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम थी, कानन ने अपनी मेहनत और प्रतिभा से दर्शकों के दिलों में एक खास स्थान बनाया और एक प्रमुख स्टार के रूप में उभरीं।
कानन देवी का जन्म 22 अप्रैल 1916 को पश्चिम बंगाल के हावड़ा में हुआ। उनका बचपन आसान नहीं था। जब वे छोटी थीं, उनके पिता का निधन हो गया, जिससे परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। उनकी मां को घर चलाने की जिम्मेदारी उठानी पड़ी, और कानन को भी छोटी उम्र में काम करना पड़ा। कठिनाइयों का सामना करते हुए, उन्होंने अपने संघर्ष को अपनी ताकत बना लिया।
कानन ने केवल 10 साल की उम्र में फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उन्हें पहली बार फिल्म 'जयदेव' में एक छोटा सा रोल मिला। उस समय महिलाओं के लिए फिल्म इंडस्ट्री में काम करना चुनौतीपूर्ण था, लेकिन कानन ने हार नहीं मानी और धीरे-धीरे अपनी पहचान बनाने लगीं। शुरुआत में वे बाल कलाकार के रूप में नजर आईं, लेकिन उनकी प्रतिभा ने जल्द ही लोगों का ध्यान आकर्षित किया।
जब कानन देवी न्यू थिएटर से जुड़ीं, तो उनके करियर को नई ऊंचाई मिली। यहां उनकी मुलाकात प्रसिद्ध संगीतकार राय चंद बोराल से हुई, जिन्होंने उन्हें संगीत की बारीकियां सिखाईं। इसके बाद उन्होंने अभिनय के साथ-साथ गायन में भी अपनी पहचान बनाई। फिल्म 'मुक्ति' उनकी सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक बनी, जिसने उन्हें स्टार बना दिया।
कानन देवी का नाम इतना बड़ा हो गया कि लोग उनकी एक झलक पाने के लिए भीड़ लगाने लगे। वे उस समय की सबसे महंगी अभिनेत्रियों में से एक थीं। जब फिल्मों का बजट कम होता था, तब भी उनकी फीस लाखों में होती थी। यही कारण था कि उन्हें बांग्ला सिनेमा की पहली सुपरस्टार कहा जाने लगा। उनके गाने भी काफी लोकप्रिय हुए।
1941 के बाद, उन्होंने स्वतंत्र रूप से काम करना शुरू किया और कई हिट फिल्में दीं। बाद में, उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस भी स्थापित किया और फिल्म निर्माण में भी हाथ आजमाया। यह उस समय की बात है जब महिलाएं इस क्षेत्र में कम ही नजर आती थीं।
उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। 1968 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया और 1976 में भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान दादा साहेब फाल्के पुरस्कार भी मिला।
कानन देवी ने लगभग तीन दशकों तक फिल्म इंडस्ट्री में काम किया और अभिनय, गायन और फिल्म निर्माण के तीनों क्षेत्रों में अपनी छाप छोड़ी। 17 जुलाई 1992 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।
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