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कौन थे पंडित देवब्रत चौधरी? सितार के जादूगर का सफर

पंडित देवब्रत चौधरी, जिन्हें प्यार से देबू चौधरी कहा जाता था, भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अद्वितीय सितारे थे। चार साल की उम्र में सितार उठाने वाले इस संगीतकार ने अपनी जिंदगी संगीत को समर्पित कर दी। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई सम्मान मिले, जिनमें पद्मश्री और पद्मभूषण शामिल हैं। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और संगीत के प्रति उनकी गहरी निष्ठा के बारे में।
 
कौन थे पंडित देवब्रत चौधरी? सितार के जादूगर का सफर

पंडित देवब्रत चौधरी: भारतीय शास्त्रीय संगीत के सितारे


मुंबई, 29 मई। भारतीय शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पंडित देवब्रत चौधरी को सभी 'देबू चौधरी' के नाम से जानते थे। उन्होंने अपने सितार की मधुर धुनों से दुनिया भर में लोगों का दिल जीता। उनकी जिंदगी की एक खास बात यह थी कि जब बच्चे स्कूल जाने की शुरुआत करते हैं, तब उन्होंने केवल चार साल की उम्र में सितार थाम लिया था।


पंडित देवब्रत चौधरी का जन्म 30 मई 1935 को रामगोपालपुर में हुआ, जो अब बांग्लादेश का हिस्सा है। बचपन से ही उनका झुकाव संगीत की ओर था। चार साल की उम्र में उन्होंने सितार बजाना शुरू किया और इस कला को अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दिया। 18 साल की उम्र में उनका पहला कार्यक्रम आकाशवाणी पर प्रसारित हुआ, जो उस समय एक बड़ा सम्मान माना जाता था।


भारत के विभाजन के बाद उनका परिवार कोलकाता चला आया, जो उस समय देश की सांस्कृतिक राजधानी मानी जाती थी। वहां रहते हुए उन्हें कई महान कलाकारों को सुनने का अवसर मिला, जिनमें उस्ताद बड़े गुलाम अली खान और उस्ताद मुश्ताक अली खान शामिल थे। बाद में, उन्होंने उस्ताद मुश्ताक अली खान से सितार की विधिवत शिक्षा ली और लगभग 38 वर्षों तक उनके साथ संगीत की बारीकियों को सीखा।


देबू चौधरी सेनिया घराने से जुड़े थे, जो तानसेन की परंपरा का हिस्सा है और रागों की शुद्धता के लिए प्रसिद्ध है। उनकी अनोखी शैली और 17 फ्रेट वाले सितार की आवाज इतनी मधुर थी कि इसे 'गाने वाला सितार' कहा जाता था।


उन्होंने संगीत शिक्षा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। दिल्ली विश्वविद्यालय के संगीत विभाग में प्रोफेसर और बाद में डीन के रूप में उन्होंने हजारों छात्रों को संगीत सिखाया। उनका मानना था कि संगीत केवल एक कला नहीं, बल्कि यह इंसान को बेहतर बनाने का एक साधन है।


पंडित देवब्रत चौधरी एक लेखक भी थे, जिन्होंने भारतीय संगीत पर कई पुस्तकें लिखीं और आठ नए रागों की रचना की। उन्होंने भारत और विदेशों में भारतीय शास्त्रीय संगीत को नई पहचान दिलाई। अमेरिका में, उन्होंने 24 रागों की रिकॉर्डिंग की, जो एक अनोखा प्रयोग माना गया।


उनके संगीत में योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से सम्मानित किया। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मान भी मिले। उनका नाम पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत खान और पंडित निखिल बनर्जी जैसे महान कलाकारों के साथ लिया जाता था।


साल 2021 में कोरोना महामारी के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई और उन्हें दिल्ली के गुरु तेग बहादुर अस्पताल में भर्ती कराया गया। 1 मई 2021 को उन्होंने अंतिम सांस ली।


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