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कादर खान: कैसे एक सिविल इंजीनियर ने बॉलीवुड में बनाई अनोखी पहचान?

कादर खान की कहानी एक सिविल इंजीनियर से बॉलीवुड के प्रमुख संवाद लेखक और अभिनेता बनने की है। उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को फिल्मों में पिरोकर दर्शकों को भावुक किया। जानें कैसे उन्होंने अमिताभ बच्चन जैसे सितारों के साथ काम किया और अपनी अनोखी पहचान बनाई। इस लेख में कादर खान के करियर के महत्वपूर्ण मोड़ और उनकी यादगार फिल्मों के बारे में विस्तार से बताया गया है।
 

कादर खान का सफर




मुंबई, 21 अक्टूबर। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता कादर खान ने अपने करियर में कभी खलनायक की भूमिका निभाई, तो कभी कॉमेडी से दर्शकों को हंसाया। उन्होंने अपनी लेखनी से अमिताभ बच्चन जैसे सितारों के किरदारों को विशेष पहचान दी। लेकिन फिल्मों में कदम रखने से पहले कादर खान की जिंदगी एक अलग ही कहानी थी। वह एक सिविल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर थे और पढ़ाई के साथ-साथ थिएटर में भी सक्रिय थे। उनके जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रमुख संवाद लेखकों में शामिल कर दिया।


कादर खान के लिखे संवादों की शक्ति का एक प्रमुख उदाहरण 1978 में आई फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' का 16 पन्नों का दृश्य है। इस दृश्य में उन्होंने अपने जीवन के अनुभवों को बखूबी पिरोया। जब उन्होंने अमिताभ बच्चन को इसे सुनाया, तो वह इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखों में आंसू आ गए।


कादर खान का जन्म 1937 में काबुल में हुआ था, लेकिन उनका परिवार बाद में मुंबई आ गया। यहां उन्होंने कठिनाइयों का सामना करते हुए अपना बचपन बिताया। पढ़ाई पूरी करने के बाद, वह मुंबई के एमएच साबू सिद्दीक पॉलिटेक्निक में लेक्चरर बने और बेस्ट टीचर का पुरस्कार भी जीता। लेकिन उनके दिल में एक्टिंग और संवाद लेखन का जुनून हमेशा बना रहा। थिएटर में उनके काम ने उन्हें फिल्मों के लिए संवाद लिखने का अवसर दिया।


कादर खान ने 1970 के दशक की शुरुआत में फिल्मों के लिए संवाद लेखन शुरू किया। 1972 में आई फिल्म 'जवानी दीवानी' उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इसके बाद राजेश खन्ना की फिल्म 'रोटी' ने उन्हें नई पहचान दिलाई।


मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे निर्देशकों के साथ उनके काम ने उन्हें फिल्म उद्योग में एक मजबूत स्थान दिलाया। उन्होंने 'अमर अकबर एंथनी', 'परवरिश', 'मुकद्दर का सिकंदर', 'लावारिस', 'नसीब' और 'कुली' जैसी फिल्मों के लिए संवाद लिखे। उनकी विशेषता यह थी कि वह किरदार के अनुसार भाषा और शैली को बदल लेते थे। उनके संवादों में कभी गुस्सा, कभी इमोशन और कभी मजाक होता था, जो दर्शकों से सीधे जुड़ जाता था।


कादर खान का एक यादगार किस्सा फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' से जुड़ा है। उन्होंने बताया कि फिल्म में एक दृश्य था, जिसमें अमिताभ बच्चन का किरदार अपनी जिंदगी की कहानी सुनाता है। इस दृश्य को लिखते समय कादर खान ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को भी शामिल किया था। यही कारण था कि वह इस दृश्य को लेकर बहुत भावुक थे। जब उन्होंने इसे फिल्म के निर्देशक प्रकाश मेहरा को सुनाया, तो वह भी भावुक हो गए।


जब यह स्क्रिप्ट अमिताभ बच्चन के पास पहुंची, तो वह 16 पन्नों के दृश्य को देखकर चौंक गए। उन्हें लगा कि इतने लंबे संवाद याद करना और उन्हें सही भाव के साथ बोलना कठिन होगा। उन्होंने इसे छोटा करने का सुझाव दिया। उस समय कादर खान दूसरी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त थे। फिर अमिताभ ने उन्हें बुलाया। कादर खान को लगा कि शायद उनके संवाद में कोई कमी निकाली गई है, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें अपनी बात समझाने का मौका मिला।


कादर खान ने एक इंटरव्यू में बताया कि जब वह अमिताभ के पास पहुंचे, तो उन्होंने सभी को कमरे से बाहर भेज दिया और खुद पूरा दृश्य पढ़कर सुनाना शुरू किया। जैसे-जैसे कादर खान अपने जीवन के अनुभवों को शब्दों में पिरोते गए, दृश्य का भावनात्मक असर बढ़ता गया।


कादर खान के अनुसार, पूरा दृश्य सुनते-सुनते अमिताभ की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें समझ आ गया कि ये सिर्फ लंबे संवाद नहीं हैं, बल्कि किरदार की जिंदगी और दर्द को व्यक्त करने वाले शब्द हैं। इसके बाद अमिताभ ने कादर खान से कहा कि वह आगे भी अपनी आवाज में दृश्य रिकॉर्ड करके दिया करें, क्योंकि उनके सुनाने का तरीका संवाद के भाव को समझने में मदद करता था।


कादर खान की पहचान केवल संवाद लेखक तक सीमित नहीं रही। 1973 में फिल्म 'दाग' से बतौर अभिनेता उनके करियर की शुरुआत हुई। गोविंदा के साथ उनकी कॉमेडी फिल्में 1990 के दशक में नई पीढ़ी के दर्शकों के बीच भी लोकप्रिय हो गईं। 'दुल्हे राजा', 'कुली नंबर 1' और 'हीरो नंबर 1' जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग को खूब सराहा गया।


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