ऋतुपर्णो घोष: बंगाली सिनेमा के जादूगर की अनकही कहानी
ऋतुपर्णो घोष का जीवन और करियर
नई दिल्ली, 29 मई। 31 अगस्त 1963 को कोलकाता में जन्मे सौराशिल घोष, जिन्हें ऋतुपर्णो घोष के नाम से जाना जाता है, ने कला की दुनिया में एक नई पहचान बनाई। उनके पिता, सुनील घोष, एक चित्रकार और डॉक्यूमेंट्री निर्माता थे, जबकि उनकी मां भी एक कलाकार थीं।
ऋतुपर्णो का शिक्षा सफर साउथ पॉइंट हाई स्कूल से शुरू होकर मौलाना आजाद कॉलेज और जाधवपुर विश्वविद्यालय तक पहुंचा, जहां उन्होंने अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की। हालांकि, उनका ध्यान हमेशा मानव भावनाओं की गहराइयों को समझने पर रहा।
सिनेमा में कदम रखने से पहले, उन्होंने विज्ञापन क्षेत्र में काम किया। 'रिस्पॉन्स इंडिया' में कॉपीराइटर के रूप में उन्होंने बंगाली विज्ञापनों को एक नई दिशा दी। उन्होंने बंगाली संस्कृति को समझा और एंटीसेप्टिक क्रीम बोरोलीन के लिए प्रसिद्ध नारा 'बोंगो जीबोनेर अंगो' दिया।
1990 के दशक की शुरुआत में, जब बंगाली सिनेमा में केवल मेलोड्रामा का बोलबाला था, ऋतुपर्णो घोष ने 1992 में बच्चों की फिल्म 'हीरेर अंग्ति' से अपने करियर की शुरुआत की। 1994 में आई उनकी फिल्म 'उनीशे अप्रैल' ने बंगाली सिनेमा को एक नई दिशा दी।
उन्होंने 'दहन' (1997), 'असुख' (1999), 'बाड़ीवाली' (1999), और 'उत्सव' (2000) जैसी फिल्मों के माध्यम से समाज के पाखंड को उजागर किया। उनकी फिल्मों ने संवेदनशील मुद्दों को उठाया, जैसे वैवाहिक बलात्कार और मानसिक असुरक्षा।
ऋतुपर्णो घोष ने 2004 में ऐश्वर्या राय और अजय देवगन के साथ 'रेनकोट' बनाई और 2007 में अमिताभ बच्चन के साथ 'द लास्ट लियर' का निर्देशन किया। अपने छोटे से करियर में उन्होंने 12 राष्ट्रीय पुरस्कार जीते।
अपने अंतिम वर्षों में, उन्होंने अपनी कला को पूरी तरह से व्यक्त करने का निर्णय लिया और 'क्वीयर ट्रिलॉजी' के तहत काम किया। उनकी फिल्म 'आरेक्ति प्रेमेर गोल्पो' में उन्होंने एक समलैंगिक फिल्म निर्माता की भूमिका निभाई।
30 मई 2013 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। मरणोपरांत, पश्चिम बंगाल सरकार ने उन्हें 'बंगा विभूषण' से सम्मानित किया।
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