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दक्षिण भारतीय सिनेमा के नायक: सोभन बाबू की अनकही कहानी

सोभन बाबू, दक्षिण भारतीय सिनेमा के एक अद्वितीय अभिनेता, ने अपने करियर में रोमांस, भावनाओं और एक्शन का अनूठा मिश्रण पेश किया। 200 से अधिक फिल्मों में काम करने वाले इस अभिनेता ने अपनी नो-किसिंग पॉलिसी के चलते एक अलग पहचान बनाई। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और कैसे उन्होंने सिनेमा में अपनी छाप छोड़ी।
 

सोभन बाबू: एक अद्वितीय अभिनेता


मुंबई, 19 मार्च। भारतीय फिल्म उद्योग में कई महान कलाकारों ने अपनी छाप छोड़ी है, लेकिन दक्षिण भारतीय सिनेमा में एक ऐसा सितारा उभरा जिसने दर्शकों को रोमांस, भावनाओं और एक्शन का अनुभव कराया।


हम यहाँ नटभूषण सोभन बाबू की बात कर रहे हैं। उनकी बहुआयामी प्रतिभा के कारण उन्हें पांच बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला।


आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के चिन्ना नंदीगामा में जन्मे सोभन बाबू का निधन 20 मार्च, 2008 को हुआ। उन्होंने चार दशकों तक दक्षिण भारतीय सिनेमा पर राज किया और अपने करियर के शीर्ष पर चार प्रमुख तेलुगु सितारों में शामिल थे। उनकी छवि तेलुगु सिनेमा में एक रोमांटिक अभिनेता के रूप में स्थापित थी।


सोभन बाबू ने कई रोमांटिक फिल्मों में काम किया, लेकिन उन्होंने कभी भी पर्दे पर किसिंग सीन नहीं किए। उनके परिवार और व्यक्तिगत नियमों के कारण उन्होंने हमेशा नो-किसिंग पॉलिसी का पालन किया।


उन्होंने 1959 में 'देवा बालम' से अपने करियर की शुरुआत की, लेकिन 1960 में 'भक्त सबरी' से उन्हें सफलता मिली। उन्होंने 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, जिनमें 'देवता', 'सोग्गडू', 'गोरिंटाकू', 'जीवन तरंगालु', 'मंचि मनुशुलु', 'कार्तिक दीपम', 'जीवन ज्योति', और 'जीवन पोरातम' शामिल हैं। उनकी फिल्म 'मंचि मनुशुलु' ने 1973 में 'आ गले लग जा' का रीमेक बनकर बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया।


सोभन बाबू असल जिंदगी में बहुत रिजर्व व्यक्ति थे और अपने परिवार को फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से दूर रखते थे।


कम ही लोग जानते हैं कि सोभन बाबू ने फिल्मों में 5-6 साल काम करने के बाद सिनेमा छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन 1965 में आई फिल्म 'वीरभिमन्यु' ने उनकी जिंदगी बदल दी। यह फिल्म महाभारत के अर्जुन के बेटे अभिमन्यु की कहानी पर आधारित थी और दर्शकों ने इसे बहुत पसंद किया।