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इक्कीस: एक संवेदनशील युद्ध फिल्म की समीक्षा

इक्कीस एक अनोखी युद्ध फिल्म है जो न केवल एक्शन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि युद्ध की संवेदनशीलता और सच्चाई को दर्शाती है। यह फिल्म सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की कहानी पर आधारित है, जिन्होंने 21 वर्ष की आयु में देश के लिए बलिदान दिया। फिल्म में युद्ध के दृश्य तनावपूर्ण हैं, लेकिन दिखावटी नहीं। इसमें धर्मेंद्र और अगस्त्य नंदा जैसे कलाकारों का शानदार अभिनय है। जानें इस फिल्म की कहानी, तकनीकी पहलू और उसके गहरे संदेश के बारे में।
 

फिल्म की कहानी और थीम

इक्कीस एक अनोखी युद्ध फिल्म है, जो न केवल एक्शन और नारेबाज़ी पर निर्भर नहीं करती। यह फिल्म युद्ध की वास्तविकता को शांति और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करती है। इसे श्रीराम राघवन ने निर्देशित किया है और यह सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की सच्ची कहानी पर आधारित है, जिन्होंने महज 21 वर्ष की आयु में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया और भारत के सबसे युवा परमवीर चक्र विजेता बने। यह एक ऐसा युद्ध ड्रामा है जो दर्शकों को बहादुरी और जिंदादिली के बारे में सोचने पर मजबूर करता है.


युद्ध का चित्रण

फिल्म का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह युद्ध को किसी तमाशे के रूप में नहीं दिखाती। इसमें राजनीति या दुश्मनी को बढ़ावा देने का प्रयास नहीं किया गया है। कहानी का मुख्य फोकस इस बात पर है कि युद्ध इंसानों से क्या छीनता है और इसके बाद जीवन कैसे बदलता है। यही कारण है कि यह फिल्म दिल को छू जाती है.


कहानी की संरचना

श्रीराम राघवन ने फिल्म की कहानी को दो अलग-अलग समय-सीमाओं में प्रस्तुत किया है। पहली समय-सीमा हमें 1971 की बसंतर की लड़ाई में ले जाती है, जहां युवा अरुण खेत्रपाल अपनी टैंक रेजिमेंट का नेतृत्व करते हैं। युद्ध के दृश्य तनावपूर्ण हैं, लेकिन दिखावटी नहीं। यहां लड़ाई से ज्यादा एक युवा अधिकारी की जिम्मेदारी, डर और साहस को दर्शाया गया है.


अभिनय और पात्र

अरुण के किरदार में अगस्त्य नंदा ने ईमानदारी और संतुलन के साथ अभिनय किया है। उनका प्रदर्शन स्वाभाविक लगता है। अरुण को एक जोशीले, अनुशासित और आदर्शवादी जवान के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनकी बहादुरी भाषणों में नहीं, बल्कि उनके निर्णयों में प्रकट होती है। एक दृश्य में, जब अरुण को पीछे हटने का आदेश मिलता है, वह अपने टैंक को छोड़ने का निर्णय नहीं लेते और फायरिंग जारी रखते हैं, जो उनके चरित्र की अमरता को दर्शाता है.


दूसरी समय-सीमा और इमोशनल कनेक्शन

दूसरी समय-सीमा हमें 2001 में ले जाती है, जो फिल्म का इमोशनल आधार बनाती है। धर्मेंद्र, जो अरुण के पिता ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल की भूमिका निभाते हैं, आज भी अपने बेटे की शहादत के साथ जीते हैं। उनकी मुलाकात ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नासिर से होती है, जिनका किरदार जयदीप अहलावत ने निभाया है। यह हिस्सा लड़ाई के बारे में नहीं, बल्कि यादों, समझ और मानवता के बारे में है.


तकनीकी पहलू

तकनीकी दृष्टि से, इक्कीस एक संतुलित फिल्म है। यह पहली बार भारतीय सिनेमा में टैंक युद्ध को दर्शाती है, और VFX तथा युद्ध के दृश्य वास्तविक लगते हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म के मूड और भावनाओं को उभारता है, और डायलॉग प्रभावशाली हैं.


फिल्म का संदेश

मैडॉक फिल्म्स के बैनर तले बनी इस फिल्म के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इक्कीस युद्ध जीतने की कहानी नहीं है, बल्कि उस कीमत की कहानी है जो युद्ध इंसानों से वसूलता है। यह फिल्म शांति का एक महत्वपूर्ण संदेश देती है और इसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा.


फिल्म की जानकारी

डायरेक्टर: श्रीराम राघवन
कास्ट: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
राइटर: श्रीराम राघवन, अरिजीत बिस्वास, पूजा लाधा सुरती
ड्यूरेशन: 143 मिनट
रेटिंग: 4