कर्नाटक संगीत के दिग्गज लालगुडी जयरामन: एक वायलिन वादक की प्रेरणादायक कहानी
लालगुडी जयरामन का संगीत सफर
मुंबई, 16 सितंबर। कर्नाटक संगीत और वायलिन की दुनिया में लालगुडी जयरामन का नाम बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने वायलिन को केवल एक साधन नहीं, बल्कि उसकी धुन में गायकी का भाव भी समाहित किया। जयरामन ने देश-विदेश के मंचों पर अपनी पहचान बनाई, लेकिन उनके बचपन में संगीत सुनना आसान नहीं था। उनके घर में रेडियो नहीं था, फिर भी उनकी संगीत के प्रति दीवानगी ने उन्हें लगभग 10 साल की उम्र में अकेले ट्रेन से कॉन्सर्ट सुनने के लिए भेजा।
शुरुआत और परिवार का योगदान
लालगुडी जयरामन का जन्म 17 सितंबर 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ, जो कई पीढ़ियों से कर्नाटक संगीत से जुड़ा हुआ था। उनके पिता, लालगुडी वी.आर. गोपाला अय्यर, खुद एक प्रसिद्ध संगीतकार और उनके गुरु थे। पिता ने उन्हें छोटी उम्र से ही संगीत की शिक्षा देना शुरू किया। जयरामन के लिए वायलिन उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन गया।
बचपन की यादें और संगीत की खोज
जयरामन का परिवार तमिलनाडु के लालगुडी में रहता था, जहां उन्होंने लंबे समय तक रियाज किया। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके घर में रेडियो नहीं था, इसलिए वह पड़ोसियों के घर जाकर या सार्वजनिक स्थानों पर रेडियो पर संगीत कार्यक्रम सुनते थे। यह उनके लिए सीखने का एक महत्वपूर्ण तरीका था। जो कुछ भी वह सुनते, उसे याद करने की कोशिश करते और फिर घर लौटकर वायलिन पर वही धुन निकालने का प्रयास करते।
प्रमुख कलाकारों के साथ सहयोग
जयरामन ने बहुत कम उम्र में बड़े कलाकारों के साथ वायलिन बजाना शुरू किया। उन्होंने मदुरै मणि अय्यर और जी.एन. बालासुब्रमण्यम जैसे दिग्गज गायकों के साथ काम किया। उन्होंने बताया कि बचपन में सुने गए गीतों ने उन्हें कलाकारों की गायकी और रचनाओं को समझने में मदद की।
लालगुडी बानी का निर्माण
आगे चलकर, लालगुडी जयरामन ने वायलिन बजाने का एक अनूठा अंदाज विकसित किया, जिसे 'लालगुडी बानी' के नाम से जाना जाता है। उनकी वायलिन की धुन में गायकी का भाव सुनाई देता था, और वह राग, ताल और शब्दों के भाव को इस तरह प्रस्तुत करते थे कि सुनने वाले को संगीत में एक कहानी का अनुभव होता था।
संगीत में योगदान और सम्मान
जयरामन की प्रतिभा केवल वायलिन बजाने तक सीमित नहीं थी। उन्होंने कई रचनाएं भी तैयार कीं, जिनमें वर्णम, तिल्लाना और 'सुलादी सप्त ताल रामायण' जैसी बड़ी रचना शामिल है। वह एक शिक्षक भी रहे और कई कलाकारों को संगीत सिखाया। उनके बेटे और बेटी ने भी इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
सम्मान और विरासत
उनकी कला को देश और विदेश में सराहा गया। भारत सरकार ने उन्हें 1972 में पद्म श्री और 2001 में पद्म भूषण से सम्मानित किया। 1978 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। 2009 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी का फेलो चुना गया। 2008 में म्यूजिक अकादमी, मद्रास ने उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट सम्मान भी दिया।
अंतिम दिन
2006 में एक स्ट्रोक के बाद, उन्होंने मंच से दूरी बना ली, लेकिन संगीत से उनका रिश्ता नहीं टूटा। वह शिक्षक और कंपोजर के रूप में सक्रिय रहे। 22 अप्रैल 2013 को 82 वर्ष की आयु में लालगुडी जयरामन का निधन हो गया।