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ओ. पी. नय्यर: संगीत के जादूगर जिनकी धुनें आज भी दिलों को छूती हैं

ओ. पी. नय्यर, हिंदी फिल्म संगीत के एक अद्वितीय जादूगर, जिन्होंने अपने रिदम और धुनों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। उनका सफर लाहौर से शुरू होकर हिंदी सिनेमा के शीर्ष पर पहुंचा। नय्यर का संगीत केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि अनुभव करने के लिए था। उनके गाने आज भी ताजगी से भरे हैं। जानें उनके जीवन की कहानी, विवाद और संगीत में योगदान के बारे में।
 

ओ. पी. नय्यर का संगीत सफर


नई दिल्ली, 15 जनवरी। हिंदी फिल्म संगीत की दुनिया में कई कलाकार आए और गए, लेकिन कुछ नाम ऐसे हैं जो हमेशा याद रहेंगे। उनमें से एक हैं ओ. पी. नय्यर। रिदम किंग और ताल के बादशाह के रूप में मशहूर, उन्होंने अपने संगीत से श्रोताओं को महफिलों में झुमाया और तन्हाई में हौसला दिया। उनका संगीत केवल सुनने के लिए नहीं था, बल्कि उसे अनुभव किया जाता था।


ओंकार प्रसाद नय्यर का जन्म 16 जनवरी 1926 को लाहौर में हुआ। बचपन से ही उन्हें संगीत में गहरी रुचि थी, लेकिन परिवार चाहता था कि वे पढ़ाई पर ध्यान दें। परिवार की चिंता थी कि संगीत में करियर बनाना जोखिम भरा हो सकता है। लेकिन नय्यर साहब का दिल तो सुरों में बस चुका था। वे चुपचाप हारमोनियम बजाते और धुनें गुनगुनाते रहते।


कहा जाता है कि ओ. पी. नय्यर फिल्मों में संगीतकार नहीं, बल्कि हीरो बनने का सपना लेकर आए थे। लेकिन किस्मत ने कुछ और ही लिखा था। हीरो बनने के लिए उन्होंने कई दरवाजे खटखटाए, लेकिन रिजेक्शन का सामना करना पड़ा। अंततः किसी ने उन्हें सलाह दी कि वे कुछ और करें, और यही 'कुछ और' उनके लिए संगीत बन गया। इस तरह शुरू हुआ एक ऐसा सफर जिसने हिंदी सिनेमा को नई पहचान दी।


1952 में आई फिल्म 'आसमान' से उन्हें पहला मौका मिला। फिल्म सफल रही, लेकिन असली पहचान उन्हें गुरुदत्त की फिल्मों से मिली। 'आर-पार', 'मिस्टर एंड मिसेज 55', 'सीआईडी' और 'तुमसा नहीं देखा' जैसे गानों ने ओ. पी. नय्यर को हर घर में पहुंचा दिया। 'बाबूजी धीरे चलना', 'कभी आर कभी पार लागा तीरे नजर', 'ऐ लो मैं हारी पिया' जैसे गाने आज भी ताजगी से भरे हैं।


ओ. पी. नय्यर की सबसे बड़ी विशेषता उनका रिदम था। उनके गीतों में पंजाबी लोकसंगीत, वेस्टर्न बीट्स और देसी ठाठ का अनूठा मिश्रण मिलता था। आश्चर्य की बात यह है कि उन्होंने अपने गानों में कभी सितार का इस्तेमाल नहीं किया, फिर भी उनका संगीत बेहद सुरीला और प्रभावशाली होता था। वे मानते थे कि हर गीत की आत्मा उसकी लय में होती है।


लता मंगेशकर के साथ उनका विवाद भी काफी चर्चित रहा। फिल्म 'आसमान' के दौरान रिकॉर्डिंग को लेकर मतभेद हुए और इसके बाद दोनों ने कभी साथ काम नहीं किया। इसके बाद ओ. पी. नय्यर ने शमशाद बेगम, गीता दत्त और खासकर आशा भोसले के साथ काम किया। आशा भोसले के करियर को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में ओ. पी. नय्यर की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता।


नय्यर और आशा भोसले का रिश्ता केवल पेशेवर नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत भी था। दोनों ने संगीत में साथ काम किया और कई सालों तक एक-दूसरे के पूरक बने रहे। लेकिन, यह रिश्ता बाद में उनके जीवन का सबसे दर्दनाक अध्याय बन गया। 1972 में दोनों के रास्ते अलग हो गए, जिसके बाद ओ. पी. नय्यर का करियर भी धीरे-धीरे ढलान पर आने लगा।


फिर भी, उनके संगीत की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी। 'चल अकेला, चल अकेला' जैसे गीतों में जीवन का दर्शन है, वहीं 'मेरा नाम चिन चिन' जैसी मस्ती भरी धुनें भी उनके हुनर का प्रमाण हैं। उन्होंने शम्मी कपूर को 'जंपिंग स्टार' बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 'तुमसा नहीं देखा' के गीतों ने शम्मी की छवि को नया रंग दिया।


एक समय था जब ओ. पी. नय्यर हिंदी सिनेमा के सबसे महंगे संगीतकारों में गिने जाते थे। लेकिन जीवन के अंतिम दौर में हालात बदले, यहां तक कि उन्हें अपना घर भी बेचना पड़ा। इसके बावजूद, उन्होंने कभी अपने फैसलों पर पछतावा नहीं किया। वे स्वाभिमानी थे और उसी गरिमा के साथ जीवन बिताया।